पितृपक्ष और ओल्ड एज होम्स

क्षमा शर्मा... वरिष्ठ पत्रकार kshamasharma1@gmail.com कई साल पहले की बात है. मैं किसी काम से एक वृद्धाश्रम में गयी थी. वहां बहुत से बुजुर्ग औरतें और मर्द थे. वे विभिन्न जातियों और धर्मों के थे. कइयों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी, मगर बच्चे उन्हें अपने साथ रखना नहीं चाहते थे. एक स्त्री और एक […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | September 25, 2019 12:35 AM

क्षमा शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
कई साल पहले की बात है. मैं किसी काम से एक वृद्धाश्रम में गयी थी. वहां बहुत से बुजुर्ग औरतें और मर्द थे. वे विभिन्न जातियों और धर्मों के थे. कइयों की आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी, मगर बच्चे उन्हें अपने साथ रखना नहीं चाहते थे.
एक स्त्री और एक पुरुष ऐसे भी थे, जो बच्चों की रोज-रोज की किच-किच से तंग आकर यहां आ गये थे और कभी बच्चों के पास लौटना नहीं चाहते थे. इन्हें सतानेवालों में सिर्फ इनके बेटे, बहुएं ही नहीं, इनकी बेटियां और नाते-रिश्तेदार भी शामिल थे.
इनके मन में दुख भी था कि बच्चों ने इस तरह जीवन के आखिरी पड़व पर अकेला छोड़ दिया. मगर यह खुशी भी थी कि अब वे किसी से बात करने के लिए तरसते नहीं थे. दिन-दिन भर पार्कों या सार्वजनिक स्थलों में बैठे रहते थे और खूब बातें किया करते थे. यहां रहनेवालों के दुख चूंकि एक जैसे थे, इसलिए कहीं कोई दुराव-छिपाव भी नहीं था.
मैं देख रही थी कि एक महिला की बेचैन आंखें बार-बार दरवाजे की तरफ देखती थीं. फिर वह किसी उदासी में खो जाती थी. मैंने कई बार उनसे पूछा कि किसका इंतजार है, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया. साथ बैठे एक बुजुर्ग ने कहा- इनकी एक ही बेटी है. छह महीने से एक बार भी नहीं आयी. आज आने को कहा था, लेकिन अब शाम हो गयी है.
इन बुजुर्गों के मन में यह लालसा लगातार बनी रहती थी कि कभी तो बच्चे उनका हाल-चाल पूछने आयेंगे. उनसे घर चलने के लिए कहेंगे. मगर ऐसा होता नहीं था. एक बार यहां छोड़ने के बाद बच्चे लौटकर नहीं आते. बच्चों से मिली इस उपेक्षा का दुख इनकी आंखों में झलकता है.
जब भी पितृपक्ष का समय आता है, तो मैं देखती हूं कि बाजारों में खरीदारी कम हो जाती है. और लोग अपने-अपने घरों में रंग-रोगन कराने के लिए, नये कपड़े और सामान खरीदने के लिए पितृपक्ष के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं. पंडितों को इतने घरों से खाने का निमंत्रण है कि वे परेशान हैं. सारे मंदिरों में इतना खाना, फल, दूध, दही और मिठाई पहुंच रही है कि इनके ढेर लगे हुए हैं.
आखिर कैसा समाज है, जिसने अपने गुजरे हुए परिजनों की पसंद के खाने-पीने के बहाने उन्हें याद करने लिए पितृपक्ष जैसी परंपरा बनायी है? जो अपने फैमिली ट्री को कभी न भूलने की व्यवस्था की, वही समाज ऐसा कैसे हो गया कि वह पितृपक्ष भी मनाता है.
इन पंद्रह दिनों में कोई भी शुभ कार्य तक नहीं किया जाता. तो दूसरी तरफ सरकारों से यह मांग की जा रही है कि अधिक से अधिक वृद्धाश्रम बनाये जायें, जिससे कि बेसहारा बुजुर्गों को एक ठिकाना मिल सके.
अधिक वृद्धाश्रमों की मांग यही तो बताती है कि जिस परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए रात-दिन परिश्रम किया, अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, वह परिवार अब इनकी जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं है और न ही इन्हें अपने साथ रखना चाहता है. जो नहीं रहे उनकी याद में पूरे पंद्रह दिन, मगर जो हैं, उनसे आंखें फेर ली गयी हैं. बेहद अफसोस है!