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भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं

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यह एक जगजाहिर तथ्य है कि कल्याणकारी सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार के कारण लाभुकों तक ठीक से नहीं पहुंच पाती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल से ही शासन-प्रशासन से इस गंभीर व्याधि को उखाड़ फेंकने का संकल्प किया है. पिछले पांच सालों से विभिन्न स्तरों पर इस दिशा में ठोस कार्रवाई और सुधार का सिलसिला जारी है. उदाहरण के रूप में आयुष्मान भारत योजना के तहत फर्जीवाड़ा कर रहे कई अस्पतालों को दंडित करने के मामलों को देखा जा सकता है.
दस करोड़ गरीब परिवारों यानी लगभग 50 करोड़ लोगों को पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराने की यह महत्वाकांक्षी पहल अपने तरह की विश्व की सबसे बड़ी योजना है. एक साल में इसके तहत लगभग 36 लाख लोग अपना इलाज करा चुके हैं. वंचित परिवारों के निरंतर पंजीकरण के साथ बड़ी संख्या में अस्पतालों को इस पहल के साथ जोड़ा जा रहा है.
लेकिन इस प्रयास में कई ऐसे अस्पताल भी हैं, जो इलाज के फर्जी दस्तावेज बनाकर या खर्च का गलत ब्यौरा देकर बीमा की राशि हड़पने में लगे हुए हैं. अब तक लगभग 12 सौ ऐसे मामले सामने आये हैं. सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 97 अस्पतालों को इस योजना से बाहर कर दिया है तथा भविष्य के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया है. फर्जीवाड़े की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कम-से-कम 376 अस्पताल जांच के दायरे में हैं, जिनमें से 338 अस्पतालों को दंडित किया जा चुका है. छह मुकदमे भी दायर हुए हैं.
इसके अलावा गलत तरीके से निकाली गयी एक करोड़ से अधिक की बीमा राशि वसूली भी गयी है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन ने स्पष्ट कहा है कि इस बीमा योजना में फर्जीवाड़ा करनेवाले अस्पतालों के विरुद्ध कार्रवाई तो होगी ही, उनका नाम भी आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित किया जायेगा, ताकि वे भविष्य में ऐसी गलती से बाज आयें. राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण ने सरकार को सुझाव दिया है कि दोषी अस्पतालों को न केवल आयुष्मान भारत योजना से, बल्कि अन्य सरकारी योजनाओं से भी बाहर कर दिया जाना चाहिए.
प्राधिकरण इस योजना को लागू करनेवाली शीर्ष संस्था है. इस वर्ष के बजट में इसके लिए लगभग आठ हजार करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है. इस योजना में फर्जीवाड़े का पता लगाने के लिए एक विशेष इकाई भी है, जिसमें पांच वैश्विक एजेंसियां हैं. सरकार ने इस योजना के सुचारू संचालन के लिए सुझावों का भी स्वागत किया है.
यदि किसी अस्पताल में जांच और उपचार के नाम पर बेजा खर्च जोड़ा जा रहा हो, तो उसकी सूचना देने के लिए भी व्यवस्था है. कुछ मामलों में सरकारी अस्पतालों से निजी अस्पतालों में रोगियों को भेजकर या एक ही औरत के आठ बार बच्चा जनने की रिपोर्ट दिखाकर बीमा के पैसे हड़पे गये हैं. ऐसे में मरीज के परिजनों, सामान्य नागरिकों, मीडिया और स्वास्थ्यकर्मियों को भी सजग रहने की आवश्यकता है, ताकि गड़बड़ियों को ठीक करने में मदद मिल सके.
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