सुनना भी एक कला है

मुकुल श्रीवास्तव स्वतंत्र टिप्पणीकार sri.mukul@gmail.com कभी-कभी यूं ही चीजों को उलट-पलट कर देखने का मन करता है. इसी तरह एक दिन जिंदगी के रंगों को देख रहा था, तो खयाल आया कि अगर हमारी जिंदगी में आवाज न होती, तो क्या होता? आवाजें हमें कितना कुछ सिखाती हैं, लेकिन इसका मोल हम सचमुच कर पाते […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | July 30, 2019 7:09 AM
मुकुल श्रीवास्तव
स्वतंत्र टिप्पणीकार
sri.mukul@gmail.com
कभी-कभी यूं ही चीजों को उलट-पलट कर देखने का मन करता है. इसी तरह एक दिन जिंदगी के रंगों को देख रहा था, तो खयाल आया कि अगर हमारी जिंदगी में आवाज न होती, तो क्या होता? आवाजें हमें कितना कुछ सिखाती हैं, लेकिन इसका मोल हम सचमुच कर पाते हैं क्या?
जितना फोकस हम बोलने पर करते हैं, उतना ही सुनने पर करते हैं क्या? आवाज का असर तो उसे ठीक से सुने जाने में ही है. अगर अच्छा बोलना है, तो थोड़ा सुनने की आदत भी होनी चाहिए. अच्छा संगीत हो या किसी की मीठी बात हमें तभी अच्छी लगेगी, जब हम सुनेंगे. सुनना भी एक कला है.
सुनने की कला को जो जितना ज्यादा जानता-समझता है, उसे जीवन उतना ही सिखाता है. जीवन की भाग-दौड़ में कितना कुछ हम सुनते हैं. कितनी तरह की आवाजें, दोस्त की पुकार, मम्मी का प्यार, और भी बहुत कुछ, पर उसमें से हमें वही याद रहता है, जिसे हम याद रखना चाहते हैं. गाने भी हमें वही अच्छे लगते हैं, जिन्हें हम गौर से सुनते हैं.
हमारे यहां कुछ ऐसे गाने सुनने में अच्छे तो हैं, पर आप ने शायद उन्हें सुना ही नहीं. ये गाने जिंदगी के बारे में आपका नजरिया बदल देंगे. शुरुआत गजल सम्राट जगजीत सिंह की आवाज से करें- ‘आवाजों के बाजारों में खामोशी पहचाने कौन’, इसे सुनते हुए हमेशा यही महसूस हुआ कि हम अभी ठीक से आवाजें सुनना भी नहीं सीख पाये हैं, तो फिर खामोशी सुनने को कौन कहे! कितना मुश्किल है यह और कितना जरूरी भी है.
मुहम्मद रफी का गाया एक गीत है- दिल की आवाज भी सुन मेरे फसाने पे न जा… (फिल्म : हमसाया) जरा सोचिये, अगर हम बोलना कम और सुनना ज्यादा शुरू कर दें, तो कितनी समस्याओं का समाधान हो जायेगा.
अब अगर कोई बड़ा हमें डांट रहा है, तो हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हैं, तो सिर्फ उसे सुन ही लें, तो बात वहीं खत्म हो जाये. पर कभी दिल बोलता है और हम सुन ही नहीं पाते- ‘कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं, कुछ ऐसी बातें होती हैं’ (फिल्म : अनुपमा), तो दिल की आवाज सुनें और समझें. अगर आप तनाव में हैं, तो सब छोड़कर शांति से कोई अच्छा गाना सुनें.
कभी-कभी किसी की आवाज हमें इतनी अच्छी लगती है कि हम सुध-बुध ही खो बैठते हैं और गा उठते हैं- ‘आवाज दो हमको हम खो गये’ (फिल्म : दुश्मन). यह आवाज आपको अच्छी क्यों लगती है? क्योंकि सामने वाला अपनी बात बहुत सलीके से कहता है. और इसीलिए हमें हमेशा यही सिखाया जाता है कि मीठा बोलना चाहिए, पर समस्या यह भी है कि हम मीठा सुनना चाहते हैं, पर बोलना नहीं.
हम रिक्शेवाले या अपने घर में काम करनेवाले से किस तरह बात करते हैं. ये लोग ही हमारे जीवन को बेहतर बनाते हैं, पर हमारा रवैया इनके प्रति कैसा रहता है? समझदार को इशारा काफी है. अगर आप नहीं समझेंगे, तो हो सकता है आपके साथ यही स्थिति आये कि आप यह गाना गाते फिरें- ‘आज पुरानी राहों से कोई मुझे आवाज न दे’ (फिल्म : आदमी).