शहर में जानवर

संतोष उत्सुक व्यंग्यकार santoshutsuk@gmail.com उनको लगा होगा कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज होता है, इसलिए बंदर वहां भी पहुंच गये, लेकिन इंसानी बीमारियों के माहिर डाॅक्टर उनकी बीमारी समझ नहीं सके. बंदरियों ने महिला डाॅक्टर्स को जख्मी कर समझाने की कोशिश की, लेकिन वे भी नहीं समझीं. शायद […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | July 26, 2019 4:24 AM
संतोष उत्सुक
व्यंग्यकार
santoshutsuk@gmail.com
उनको लगा होगा कि भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में बड़ी से बड़ी बीमारी का इलाज होता है, इसलिए बंदर वहां भी पहुंच गये, लेकिन इंसानी बीमारियों के माहिर डाॅक्टर उनकी बीमारी समझ नहीं सके. बंदरियों ने महिला डाॅक्टर्स को जख्मी कर समझाने की कोशिश की, लेकिन वे भी नहीं समझीं. शायद बंदरियों को लगा होगा कि डाॅक्टर महिलाएं उनके बच्चों का दर्द जरूर समझेंगी.
इस बीच यह पता चला कि हस्पताल में रेबीज के इंजेक्शन नहीं हैं. इतने दशकों में धर्माचार्य, वनाचार्य, नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री नहीं समझ सके, तो आम आदमी की क्या बिसात. भूखे बंदरों ने सोचा होगा कि दिलवालों की दिल्ली में खाने-पीने का बढ़िया इंतजाम हो जायेगा, लेकिन वे जानवर ठहरे. उन्हें दिल्ली वालों द्वारा खाने-पीने के तौर-तरीकों का क्या पता.
बंदरों द्वारा इंसान को काटे जाने का मुआवजा मांगा जा रहा है, क्या बंदरों को उनका घर उजाड़ने का उचित मुआवजा मांगने संसद जाना चाहिए? बंदर क्या कहना चाहते हैं, आदमी सुनना नहीं चाहता. बंदरों को विश्वास हो गया है कि अब आदमी भी ‘बंदर’ होता जा रहा है. इंसान ने उन्हें उजाड़ने के सारे प्रयास कर लिये, अब तो उन्हें बसाना ही आखिरी उपाय रहेगा.
जिन लोगों ने जानवरों को न मारने के कानून बनाये, निश्चय ही वे पशु प्रेमी होंगे. उनके मानवतावादी दृष्टिकोण ने भी बंदरों को चैन से नहीं रहने दिया. मरने की सीधी सजा सुना दी होती, तो सुख से मरते. लगता है बंदर समझ गये हैं कि उनके पुनर्वास के लिए जंगल रोपने का नाटक कई दशकों से हो रहा है. नाटक, नारों, प्रस्तावों, जुलूसों, बैठकों व कागजी परियोजनाओं के वृक्ष, जिन पर फल लगने हैं, अभी तक ठीक से नहीं उगे.
प्रशासन को चाहिए अब बिना कानून बनाये हर परिवार को बंदर बांट दे. यह काम पंचायतें व नगरपालिकाएं बेहतर कर सकती हैं. उनके पास सभी मकानों व परिवारों का पूरा ब्योरा होता है. हर सार्वजनिक प्रतिनिधि इस मामले में संजीदगी से काम करे.
मकान में रहनेवाले इंसानों की जिम्मेदारी होगी कि वे ‘पूर्वजों’ के साथ मिलकर रहे. इस बहाने हम सभी, जो पशु प्रेम की बातें करते हैं, उनका वास्तविक टेस्ट भी हो जायेगा. समाज के वैभवशाली, प्रभावशाली, शक्तिशाली, रसूखशाली और सभी किस्म की ताकतें रखनेवालों को अधिक बंदर दिये जायें.
इस बहाने उनका वन्य जीव सेवा का सपना ज्यादा व्यावहारिक ढंग से पूरा होगा. करोड़ों राशि प्रशासन ने आज तक पूर्वजों के नाम पर बांटी है, सरकार चाहे तो भविष्य में काफी कम खर्च कर, पशु चिकित्सालयों में सुविधाएं उपलब्ध करवाकर अपने दायित्व से मुक्त हो सकती है.
पिछले दिनों एक मोरनी भी बच्चों के साथ संसद भवन परिसर में देखी गयी है. वह भी जरूर फरियाद लेकर ही आयी होगी खास लोगों के पास, क्योंकि आम लोग तो कुछ करने लायक नहीं होते. बंदर, जो आक्रामक होते जा रहे हैं उनकी भाषा कोई नहीं समझ रहा, बेचारी शांत मोरनी की कौन समझेगा. क्या शहर में सभी किस्म के ‘जानवर’ ज्यादा हो गये हैं?