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धनिकों पर कर

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इस साल के बजट में बहुत धनी लोगों पर अधिक कर लगाने के मामले में संसद और संसद के बाहर बहस चल रही है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सही ही कहा है कि ऐसे धनिकों की संख्या पांच हजार से अधिक नहीं हैं, मगर समूची आबादी को इसकी चिंता हो रही है कि उनके ऊपर कर बढ़ा दिया गया है. सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और विकास योजनाओं के समुचित धन जुटाने की चुनौती सरकारों के सामने हमेशा रहती है.

हमारे देश में भले ही लगभग सात करोड़ लोग आयकर ब्योरा जमा करते हों, पर इनमें से दो करोड़ से अधिक कोई कर नहीं चुकाते हैं. ऐसी कंपनियों की संख्या करीब चार लाख है. कराधान की विभिन्न प्रणालियों में सुधार तथा पारदर्शिता बढ़ाने के उपायों से भविष्य में इस स्थिति के बेहतर होने की उम्मीद है. अर्थव्यवस्था के बढ़ते जाने और क्रय-शक्ति में वृद्धि से भी अधिक राजस्व प्राप्ति की अपेक्षा है.

ऐसे में गरीबी हटाने तथा वंचितों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के प्रयासों के लिए कुछ धन जुटाने के लिए बहुत धनी लोगों पर कर बढ़ाया गया है. वित्त मंत्री ने उचित ही कहा है कि धनिकों ने धन और रोजगार पैदा करने में अग्रणी भूमिका निभायी है तथा यह कर वृद्धि उनके कारोबार पर असर डालने या उनके धन को लेने की कोशिश नहीं है, बल्कि गरीबों के लिए सहयोग है.

बीते सालों में सामाजिक और आर्थिक रूप से निचले पायदान के लोगों को विकास की मुख्य धारा में समावेशित करने के लिए कई वित्तीय, शैक्षणिक और स्वास्थ्य-संबंधी पहलें की गयी हैं. इन्हें कामयाब बनाने के लिए धनी, मध्यम वर्ग और निर्धन को अपने स्तर पर योगदान करना होगा. यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हालिया दशकों में आय और संपत्ति की विषमता भारत समेत पूरी दुनिया में बढ़ती जा रही है.

हमारे देश में संपत्ति के सालाना अर्जन का तीन-चौथाई भाग आबादी के ऊपरी दस फीसदी लोगों के पास चला जाता है. ऐसे में उनसे यह उम्मीद करना वाजिब है कि वे हाशिये पर पड़े तबकों को आगे ले जाने में हाथ बटाएं. आर्थिक विकास तभी अर्थपूर्ण है, जब उसका लाभ कमोबेश सभी को मिले. निर्धनता और विषमता की खाई को पाटे बिना हम अपनी अर्थव्यवस्था को ठोस आधार नहीं दे सकते हैं.

अपनी आमदनी का एक हिस्सा देकर धनवान लोग देश को आगे ले जाने में अपने योगदान को और भी विस्तार दे सकते हैं. कर न देने, चोरी करने और आय छुपाने की समस्या बहुत पुरानी है. वैश्विक परिदृश्य में धन को देश से बाहर ले जाना या देश के भीतर ही उसे किसी अन्य खाते में दिखाना भी आसान हुआ है.

हालांकि डिजिटल निगरानी और सरकारी मुस्तैदी से हालात बेहतर हुए हैं, पर इस चुनौती से पूरी तरह निबटने की सूरत नजर नहीं आती है. आशंकाओं के बावजूद यह उम्मीद की जा सकती है कि देश और समाज में बहुत संपत्ति और आय अर्जित करनेवाले लोग सकारात्मकता के साथ देश-निर्माण में सहयोगी होंगे.

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