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मैनुफैक्चरिंग पर जोर

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रोजगार और उत्पादन में बढ़ोतरी कर मैनुफैक्चरिंग सेक्टर अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बीते डेढ़ दशकों से इसे प्राथमिकता देने के बावजूद संतोषजनक नतीजे नहीं मिल सके हैं. यूपीए सरकार सकल घरेलू उत्पादन में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी को 16-17 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी तक नहीं ले जा सकी थी और मौजूदा सरकार के पहले कार्यकाल में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का प्रदर्शन भी अपेक्षा से कम रहा.
वस्त्र उद्योग जैसे कुछ सेक्टर निर्यात में मंदी तथा घरेलू बाजार में आयातित वस्तुओं से प्रतिद्वंद्विता के कारण अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. बरसों से उद्योग जगत अतिरिक्त संरक्षण की मांग कर रहा था, पर हाल में ही सरकार ने ध्यान देना शुरू किया है. साल 2018-19 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री ने मोबाइल फोन और कुछ इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं पर आयात शुल्क में वृद्धि की थी.
इस वर्ष के बजट में वित्त मंत्री ने घरेलू उद्योगों, खासकर छोटे और मझोले उद्यमों, के हितों के लिए अनेक वस्तुओं पर शुल्क लगाने या बढ़ाने की घोषणा की है. लेकिन ऐसे उपायों से फौरी राहत ही मिलेगी. आसान शर्तों पर धन उपलब्ध कराने की जरूरत को पूरा करने के लिए एक निगम की स्थापना का सराहनीय प्रस्ताव तो किया गया है, पर अनेक विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तरह विकास वित्त संस्थाओं की स्थापना पर विचार किया जाना चाहिए. साल 2018-19 में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का 20 फीसदी ही मैनुफैक्चरिंग को मिला था.
ऐसे निवेश से ‘मेक इन इंडिया’ को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला था. जिन देशों को उत्पादन लक्ष्यों में सफलता मिली है, वहां पहले सार्वजनिक निवेश किया गया है और बाद में निजी निवेश आया है. बजट में ऐसे प्रावधानों से निवेशकों को उत्साहित किया जा सकता था, जो कुछ सालों से कमतर है. हालांकि, बजट के अनेक प्रस्तावों से उम्मीदें भी बढ़ी हैं.
कॉरपोरेट कर के 25 फीसदी के दायरे में 400 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर की कंपनियों को लाना, छोटे और मझोले उद्यमों के लिए ब्याज में राहत के लिए आवंटन, लेन-देन व भुगतान को आसान बनाने के उपाय, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने जैसी पहलों से मैनुफैक्चरिंग को निश्चित रूप से बढ़ावा मिलेगा. प्रधानमंत्री कर्मयोगी मानधन योजना से सालाना डेढ़ करोड़ रुपये टर्नओवर से कम के करीब तीन करोड़ दुकानदारों और कारोबारियों को पेंशन का लाभ देने की घोषणा भी स्वागतयोग्य है.
स्टैंड अप योजना को 2025 तक बढ़ाने, डिजिटल तकनीक के क्षेत्र में कौशल विकास, करों और शुल्कों से जुड़े लंबित विवादों को जल्दी सुलझाने की पहल, 50 हजार दस्तकारों को आर्थिक प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिशों से भी छोटे और मझोले उद्यमियों में विश्वास का संचार होने की आशा है. ऐसे में यह अपेक्षा की जा सकती है कि सरकार अन्य जरूरी उपायों को लागू करने का भी प्रयास करेगी.
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