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काले धन की समस्या

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वित्तीय अपराध और कर चोरी भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की प्रमुख बाधाओं में हैं. ऐसी भ्रष्ट गतिविधियों से अर्जित धन का एक बड़ा हिस्सा अवैध तरीकों से विदेश पहुंचा दिया जाता है. काले धन का हिसाब लगाने, उसे वापस देश में लाने तथा कायदे-कानूनों के जरिये अवैध वित्तीय व्यवहारों पर अंकुश लगाने की कोशिशें सरकारी स्तर पर होती रही हैं.

बीते पांच सालों में इस मसले पर ठोस पहलकदमी हुई है, लेकिन इस समस्या का समाधान बहुत चुनौतीपूर्ण है. काले धन की समस्या पर बनी संसद की स्थायी समिति विदेशों में अवैध रूप से जमा भारतीय पूंजी का निश्चित आकलन नहीं कर सकी है.
समिति ने वित्तीय शोध और अध्ययन से जुड़े तीन प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाओं के अध्ययन का संज्ञान लिया है, लेकिन इनके आकलन में व्यापक अंतर है. एक अध्ययन के अनुसार, 1997 से 2009 के बीच देश से बाहर गये काले धन की मात्रा सकल घरेलू उत्पादन का 0.2 से 7.4 फीसदी हो सकती है, तो दूसरी रिपोर्ट बताती है कि 1980 से 2010 की अवधि में भ्रष्ट भारतीयों द्वारा बाहर ले जायी गयी रकम 384 अरब डॉलर से 490 अरब डॉलर के बीच हो सकती है.
तीसरी रिपोर्ट का आकलन है कि 1990 से 2008 के बीच विदेश गये देशी धन की मात्रा 216.48 अरब डॉलर है. सरकार भी मानती है कि पारदर्शिता और नियमन की कमी तथा आकलन की प्रक्रिया पर सहमति न होने के कारण किसी सर्वमान्य आंकड़े का निर्धारण संभव नहीं है.
संसदीय समिति ने वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग से देश के भीतर और बाहर काले धन का पता लगाने, वापस लाने तथा दोषियों को दंडित करने की कोशिशों को जारी रखने को कहा है. साल 2009 में संसदीय समिति के कहने के बाद 2011 में तत्कालीन सरकार के निर्देश पर तीन संस्थाओं ने अवैध तरीके से कमाये और जमा किये गये धन के आकलन का काम शुरू किया था, जिसे इन तीन राष्ट्रीय संस्थाओं ने 2014 में पूरा कर लिया था.
इनमें यह भी जानकारी दी गयी है कि रियल एस्टेट, खनन, दवा निर्माण, तंबाकू, सोने-चांदी, सिनेमा और शिक्षा जैसे कारोबारों में सबसे अधिक काला धन है. कुछ समय पहले छपी रिपोर्टों की मानें, तो इन तीनों अध्ययनों में एक बात को लेकर पूरी सहमति है कि विदेश से कहीं बहुत अधिक काला धन देश के भीतर है. माना जाता है कि नवंबर, 2016 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी का एक बड़ा आधार यही था.
इसके अलावा वस्तु एवं सेवा कर, काला धन पर कराधान कानून, कर चोरी रोकने के लिए नियमन और विभिन्न देशों के साथ करार, बेनामी कानून में संशोधन जैसी पहलें पिछले सालों में की गयी हैं. अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने, डिजिटल लेन-देन बढ़ाने और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नुकसानदेह वित्तीय व्यवहार को रोकने के लिए भी अनेक कदम उठाये गये हैं. इन उपायों के सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं, पर काला धन अर्जित करने और उसे छुपाने पर निरंतर निगरानी की जरूरत बनी हुई है.
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