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संकट में धरती

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धरती पर जीवन का प्राकृतिक तंत्र तीव्र गति से नष्ट हो रहा है. दस लाख जीवों और पौधों की प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं. इस त्रासदी से मानव सभ्यता का अस्तित्व भी खतरे में है. पृथ्वी के स्वास्थ्य का पहला व्यापक अध्ययन कर दुनियाभर के 450 वैज्ञानिकों ने इस भयावह संकट को रेखांकित किया है.

संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी इस अध्ययन के अनुसार, प्रकृति के नष्ट होने की गति बीते एक करोड़ वर्षों के औसत से सैकड़ों गुनी अधिक है. पहले के युगों में जैविक और भौगोलिक कारणों से बड़े पैमाने पर प्रजातियां नष्ट होती थीं तथा पारिस्थितिकी में परिवर्तन होता था. परंतु वर्तमान संकट मनुष्य की अंधाधुंध आर्थिक वृद्धि की वजह से पैदा हुआ है.

पानी की कमी और जलवायु अस्थिरता के रूप में इसके गंभीर नतीजे भी हमारे सामने आने लगे हैं. धरती पर जीवन के विविध रूपों की सहभागिता से ही सबका अस्तित्व बना और बचा हुआ है. उदाहरण के तौर पर हम मधुमक्खियों को ले सकते हैं, जो परागण में मदद कर दुनिया के 30 फीसदी खाद्य उत्पादन में योगदान करती हैं.

जलीय शैवाल पानी को शोधित करते हैं. जंगल बाढ़ रोकने में सहायक होते हैं. मिट्टी में पाये जानेवाले जीव उसकी उर्वरा बढ़ाते हैं. पिछले साल अक्टूबर में वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने एक अहम रिपोर्ट में आकलन दिया था कि 1970 से अब तक 60 फीसदी स्तनधारी जीव, रेंगनेवाले जीव, पक्षी, मछलियां आदि दुनिया से खत्म हो चुके हैं. यदि मानव आबादी में 60 फीसदी कमी आती, तो उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, चीन, ऑस्ट्रेलिया समेत ओशेनिया के देश व द्वीप खाली हो जाते. इससे तबाही का अंदाजा लगाया जा सकता है.

साल 2018 में ब्रिटेन के नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्ययन में पहली बार जैव भार का व्यापक आकलन किया गया था. इसके मुताबिक सभी जीवों में मनुष्य की 7.6 अरब आबादी का हिस्सा महज 0.01 फीसदी है, परंतु सभ्यता की शुरुआत से हम स्तनधारियों की 83 फीसदी आबादी और आधे पेड़-पौधों को बर्बाद कर चुके हैं.

अगर बर्बादी का यह सिलसिला आज थम भी जाता है, तब भी प्रकृति को पहले की स्थिति में आने में 50 से 70 लाख साल लग जायेंगे. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मानव जाति के भविष्य को बचाना है, तो वैश्विक आर्थिक और वित्तीय तंत्र में ठोस बदलाव करने होंगे. तीन साल के अथक अध्ययन के बाद तैयार की गयी 18 सौ पन्नों की इस रिपोर्ट को 130 देशों की सहमति मिली है जिनमें अमेरिका, रूस और चीन भी शामिल हैं. नीति-निर्धारकों के लिए इस रिपोर्ट की मुख्य बातों को 40 पन्नों में समेटकर पेश किया गया है.

इसमें कहा गया है कि इतिहास में मनुष्य ने हमेशा ही धरती को नुकसान पहुंचाया है, पर बीते पांच दशकों ने भयानक घाव दिये हैं. बढ़ते तापमान, आपदाओं की आवृत्ति, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण पर अब ठोस पहलकदमी की जरूरत है. यह पूरी धरती के लिए आपात स्थिति है.

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