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तूफान से मुस्तैद मुकाबला

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जिस मेहनत और हौसले से ओड़िशा ने चक्रवात ‘फोनी’ का सामना किया है, उसकी पुरजोर सराहना आज संयुक्त राष्ट्र से लेकर सोशल मीडिया तक हो रही है. बीस वर्ष पहले ऐसे ही तूफान से करीब 10 हजार मौतें हुई थीं.

तब तबाही का आकलन 4.44 अरब डॉलर लगाया गया था, पर इस बार मौसम विभाग की सटीक सूचना और पूर्वानुमान तथा केंद्र व राज्य सरकारों की मुस्तैदी के कारण न सिर्फ बड़ी तादाद में लोगों को बचाया जा सका, बल्कि संपत्ति को बचाने में भी बहुत हद तक कामयाबी मिली है. अब तक मरनेवालों की संख्या 16 बतायी जा रही है.

जेनेवा में 13 मई से होनेवाली आपदा प्रबंधन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की बैठक में इस प्रकरण पर विशेष चर्चा का प्रस्ताव है. तूफान से निबटने की ठोस तैयारी का ही नतीजा है कि इसके गुजरने के साथ ही इससे प्रभावित 10 हजार गांवों और 52 शहरी इलाकों में राहत और पुनर्वास का काम शुरू कर दिया गया है. ओड़िशा की यह उपलब्धि बहुत महत्वपूर्ण है. हमारा देश दुनिया के उन हिस्सों में से है, जहां प्राकृतिक आपदाओं का सिलसिला बना रहता है.

ऐसे में ओड़िशा के अनुभव पूरे देश के लिए आदर्श होने चाहिए. सैटेलाइट, रिमोट सेंसिंग, सामुद्रिक विज्ञान, मौसम, सूचना आदि के क्षेत्र में हमारे पास विकसित अत्याधुनिक तकनीक हैं, जिनके सहारे आपदाओं का अनुमान लगाना आसान हुआ है. इन अनुमानों के आधार पर समुचित संसाधन और सक्षम प्रबंधन के सहारे जान-माल को बचाया जा सकता है. सोशल मीडिया पर चल रही तस्वीरों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस लगन और मेहनत से राज्य पुलिस और प्रशासनिक महकमे ने 12 लाख लोगों को 24 से 36 घंटे में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया. ओड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सही ही इसे इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई बताया है.

उल्लेखनीय है कि 1999 के तूफान के समय मुख्यमंत्री आवास में एक सैटेलाइट फोन हुआ करता था और खराब मौसम के कारण सामान्य टेलीफोन सेवा बाधित थी, लेकिन इस बार लाखों मोबाइल संदेश भेजे गये, मछुआरों को वायरलेस से आगाह किया गया तथा लाउडस्पीकरों के साथ रेडियो व टेलीविजन से लगातार सूचनाएं दी गयीं. तूफान जाते ही दूरसंचार और यातायात सेवाओं को एक हद तक बहाल भी कर लिया गया. तकनीकी विकास, मानवीय सक्रियता और साजो-सामान के इंतजाम ने इस आपदा की चुनौती का कामयाब मुकाबला किया है. ओड़िशा ने 1999 की तबाही से सबक लिया और आज नतीजा सामने है.

अब पूरे देश को ओड़िशा से सीखने की जरूरत है. मुंबई, चेन्नई और केरल की बाढ़ की विभीषिका को बहुत दिन नहीं हुए हैं. ये इलाके हर मायने में ओड़िशा से विकसित हैं, पर वे बर्बादी को कमतर नहीं कर सके. केंद्रीय और राज्यस्तरीय आपदा प्रबंधन के विभागों और प्रशिक्षण संस्थानों को चुस्त-दुरुस्त बनाने के साथ इनके अन्य विभागों से बेहतर तालमेल पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. सूचना, संसाधन, प्रबंधन और प्रशासन की सहभागिता से ओड़िशा की तरह आपदाओं का मुकाबला संभव है.

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