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Home Opinion जापान के नये सम्राट से उम्मीद

जापान के नये सम्राट से उम्मीद

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तरुण विजय
वरिष्ठ भाजपा नेता
tarunvijay55555@gmail.com
जापान से हमें बहुत कुछ सीखना चाहिए, क्योंकि जापान एक ऐसा देश है, जो अपनी परंपराओं की रक्षा और निर्वाह बखूबी करता है. भारत में यदि कोई प्राचीन परंपराओं को संभालने की बात करता है, तो उनके बारे में यह कहा जाता है कि ये लोग अतीतजीवी हैं. ऐसे लोग यह बात नहीं समझते कि भविष्योन्मुखी होने के लिए अतीत को त्यागना या उसका अपमान करना जरूरी नहीं है. ये लोग जापान को नहीं देखते, जिसने यह बात सिद्ध करके दिखायी है.
जापान में ढाई हजार साल से भी पुरानी राजवंशीय परंपरा आज भी फल-फूल रही है तथा बीते 30 अप्रैल को वहां के सम्राट अकिहितो ने 85 वर्ष की आयु में अपने स्वास्थ्य कारणों से सिंहासन त्याग कर दिया और अगले दिन यानी एक मई, 2019 को उनके 59 वर्षीय पुत्र राजकुमार नारूहितो ने जापान के 126वें सम्राट के रूप में पद संभाला. इसके साथ ही सदाबहार पुष्प सिंहासन (गुलदाउदी) पर बैठे नये सम्राट नारूहितो ने जापान में एकता के सूत्र को अपनाते हुए एक नये युग का प्रारंभ किया.
सम्राट नारूहितो ने इंग्लैंड में अवस्थित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई की है, तथा उनकी पत्नी साम्राज्ञी मसाको ने भी अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की है.
वे जापान के ऐसे पहले सम्राट हैं, जिनका जन्म दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुआ और पश्चिमी तौर-तरीकों तथा शिक्षा में निष्णात हैं. अपने पूर्वजों की तुलना में वे युवा तथा बेहद प्रगतिशील विचारों के धनी हैं. आज के समय में जब जापान आर्थिक मंदी, घटती जन्म दर, बूढ़े लोगों की बढ़ती संख्या तथा महिला-पुरुष भेद जैसी समस्याओं से गुजर रहा है, सम्राट नारूहितो पर जापान के लोगों की बहुत आशाएं टिकी हुई हैं.
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 1945 तक जब अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराकर उसे परास्त किया, वहां के सम्राट को देवस्वरूप माना जाता था. उस हमले से हुई जापान में तबाही तथा पराजय से टूट चुके सम्राट हीरोहितो ने दैवी रूप का प्रभामंडल हटाने की घोषणा कर दी.
जापान को नये सिरे से बनाने का काम तथा टूटते मनोबल को उठाने की जिम्मेदारी हीरोहितो तथा उनके बेटे राजकुमार अकिहितो ने संभाली. हिरोशिमा का घाव मिटना मुश्किल था. अमेरिका ने जापान का नया संविधान कुछ इस प्रकार बनवाया कि सम्राट के पास सिर्फ दिखावटी संवैधानिक अधिकार रहे. फिर भी जापानी जनता के मन में अपने सम्राट के प्रति सम्मान और उनकी महानता का बोध तनिक भी कम नहीं हुआ. जापान पुन: उद्योग, व्यापार, चिकित्सा तथा प्रत्येक नागरिक को उन्नति और समृद्धि का अवसर देने में विश्व में शिरोमणि बना.
एक करोड़ तीस लाख की आबादी वाला जापान, लगातार भ्ूकंपों को झेलनेवाला जापान और चीन से आक्रामक तेवर भी संभालनेवाला जापान केवल आत्मरक्षा के लिए सेना रख सकता है. लेकिन, जापान की प्रति व्यक्ति आय और औसत आयु विश्व में सर्वोपरि है. ‘मेड इन जापान’ का अर्थ आज भी दुनिया में सर्वाधिक विश्वसनीय तथा दीर्घकालिक और बिना किसी तकलीफ के चलनेवाले उत्पादों के लिए जाना जाता है.
भारत-जापान संबंध सम्राट नारूहितो के काल में और बेहतर बनेंगे. यह स्वाभाविक विश्वास है, क्योंकि जापान के साथ भारत के संबंध व्यापार, राजनीति और कूटनीति से परे पारस्परिक विश्वास तथा धार्मिक, लोकतांत्रिक और सभ्यतामूलक सूत्रों के साझेपन से सिंचित हैं.
जापान का बहुसंख्यक समाज शिंतो धर्म को मानता है, जो हिंदू धर्म से बहुत कुछ मिलता-जुलता है. पुनर्जन्म, माता-पिता का सम्मान और पारिवारिक मूल्य, वर्ष में एक बार पितरों का स्मरण और उन्हें पुण्यांजलि, प्रकृति की पूजा जैसे संस्कार शिंतो धर्म में बहुत गहराई से विद्यमान हैं. भारत की फिल्मों में भी विभिन्न रूपों और प्रकारों से जापान बड़ी आत्मीयता के साथ अभिव्यक्त होता रहा है. तमिलनाडु के महान अभिनेता रजनीकांत जापान के बहुत लोकप्रिय हीरो माने जाते हैं और उनका वहां बड़ा आदर है. बौद्ध मत जिन भारतीय भिक्षुओं के माधयम से जापान में प्रसारित हुआ, उनकी स्मृति में क्योटो के पास एक विशाल मंदिर है तथा आज भी वहां सरस्वती तथा गणपति की पूजा होती है.
भारत में जापानी सहयोग से सुजुकी मोटर्स ने संजय गांधी के साथ मारुति कार बनाना शुरू किया और हम सभी यह बात अच्छी तरह मानते हैं कि मारुति 800 ने भारत की सड़कों का नक्शा ही बदल दिया.
दिल्ली सहित अनेक प्रदेशों में मोटर वाहन और रेलगाड़ियां जापान की ही देन हैं, तो वहीं भारत की पहली बुलेट ट्रेन भी पूर्णतया जापानी सहयोग से ही निर्मित हो रही है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस तथा क्रांतिकारी रासबिहारी बोस जापान के सामान्य जन के भीतर बेहद आदर और सम्मान के साथ याद किये जाते हैं. हमारे लिए यह कितने गौरव की बात है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जापान की सहायता से ही अंडमान-निकोबार आजाद करवाया था और उसका नाम शहीद और स्वराज रखा था.
जापान के साथ वर्तमान समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के मध्य असाधारण आत्मीय संबंधों ने एक नया अध्याय प्रारंभ किया. जापान यात्रा के समय नरेंद्र मोदी तत्कालीन सम्राट अकिहीतो से राजमहल में विशेष चर्चा के लिए आमंत्रित किये गये थे.
नरेंद्र मोदी ने जापान में एक सशक्त और अत्यंत विश्वसनीय आत्मीय मित्र के नाते बहुत गहरी छाप छोड़ी है, जिसके परिणामस्वरूप रक्षा क्षेत्र में जापान के साथ वार्षिक मलाबार सैन्य अभ्यास, और नागरिक परमाणु सहयोग संभव हो पाया है.
जापानी फिल्मों के महानायक अकिरा कुरोसोवा, यासुजिरो तथा ताकाशी शिमीजु ने सत्यजीत रे और गुरुदत्त जैसे भारत के महान निर्देशकों को खूब प्रभावित किया था.
जापान से आज हमारे जिस तरह के संबंध हैं, वैसे शायद ही किसी अन्य देश से हों. सम्राट नारूहितो जापान की सामान्य जनता के महानायक और पूजित प्रतीक हैं. जापान में सम्राट जीवनपर्यंत पद पर बने रहते हैं. केवल सम्राट अकिहीतो ही पिछले दो सौ साल में पहले ऐसे सम्राट हुए, जिन्होंने अपने जीवन काल में ही सिंहासन त्यागा. सम्राट नारूहितो के साथ भारतीय जनता और विचारकों के संबंध प्रगाढ़ हों, यह हमारे राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों के बढ़ने से भी ज्यादा जरूरी है.
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