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बड़ी कूटनीतिक जीत

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सुरक्षा परिषद् द्वारा जैशे-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित किया जाना भारतीय कूटनीति की महत्वपूर्ण उपलब्धि है.

हालांकि, उसके गिरोह को 2001 में ही आतंकी सूची में डाल दिया था तथा 2009 में भारत ने भी अजहर को आतंकी घोषित करने का प्रस्ताव दिया था, किंतु अंतरराष्ट्रीय राजनीति की खींचतान और चीन के अड़ियल रवैये के कारण वह बचता रहा था. पुलवामा हमले के बाद भारत ने इस दिशा में ठोस पहलें की और चीन को भी भरोसे में लेने की कोशिश हुई. कुछ दिन पहले विदेश सचिव विजय गोखले ने ठोस दस्तावेजों के आधार पर मसूद अजहर के खतरनाक हरकतों से चीनी नेतृत्व को अवगत कराया था. चीन ने भी अपने रुख में बदलाव के बारे में जानकारी देते हुए कहा है कि ऐसा नये सबूतों के कारण हुआ है.

भारतीय प्रयासों के कारण ही फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका न सिर्फ प्रस्ताव लेकर आये, बल्कि उन्होंने यह भी कह दिया था कि अगर सुरक्षा परिषद् में प्रस्ताव फिर से रुक जाता है, तो वे इस मसले पर खुली चर्चा करायेंगे. इससे भी चीन पर दबाव बढ़ा, क्योंकि ऐसी कोई भी चर्चा उसे अलग-थलग कर सकती थी. कई सालों से भारत विभिन्न मंचों पर और द्विपक्षीय बातचीत में देशों को पाकिस्तान-समर्थित आतंकी गिरोहों के बारे में कहता रहा है.

मसूद अजहर, सैयद सलाहुद्दीन, हाफिज सईद जैसे सरगना कश्मीर समेत भारत में अलग-अलग जगहों पर आतंकी हमलों को अंजाम देते रहे हैं. इनसे जुड़े चरमपंथी और हिंसक गिरोह अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और ईरान में भी सक्रिय हैं. पाकिस्तान से अपनी गतिविधियों के संचालन करने के बावजूद इन्होंने वहां की जनता को भी अपना शिकार बनाया है. सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव में मसूद अजहर के अल-कायदा और तालिबान से गठजोड़ को रेखांकित किया गया है.

बालाकोट में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई आलोचना न होने से भी यह इंगित हुआ था कि दुनिया में आतंक को लेकर एक आम राय बन रही है तथा भारत की ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. चीन द्वारा इस प्रस्ताव पर सहमत होने से भारत के साथ उसके संबंधों पर भी सकारात्मक असर होने की उम्मीद है. यह दोनों देशों के आर्थिक एवं सुरक्षा हितों के लिए शुभ संकेत है.

लेकिन, यह भी ध्यान रखना होगा कि मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित कराना आतंक के विरुद्ध लड़ाई में एक कदम ही है, क्योंकि पहले की पाबंदियों के बावजूद विभिन्न गिरोह हमलावर होते रहे हैं. ऐसे में सबसे जरूरी है कि पाकिस्तान पर पूरी दुनिया दबाव बनाये कि वह आतंक को शह देना बंद करे. अक्सर ताकतवर देश अपने हितों के कारण आतंकवाद पर दोहरा मानदंड अपनाते हैं.

इससे उन्हें बड़ा नेटवर्क बनाने में मदद मिलती है. यह वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है. आतंकवाद के विरुद्ध व्यापक अंतरराष्ट्रीय एकजुटता आवश्यक है और सुरक्षा परिषद् का निर्णय इस दिशा में एक बड़ी पहल है.

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