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Home Opinion किम-पुतिन मुलाकात के मायने

किम-पुतिन मुलाकात के मायने

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शशांक

पूर्व विदेश सचिव

delhi@prabhatkhabar.in

उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग-उन और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच पहली मुलाकात हुई है. हालांकि, इस मुलाकात में किसी तरह का कोई समझौता नहीं हुआ. लेकिन, इतना जरूर है कि दोनों नेता इस बात को लेकर प्रतिबद्ध दिख रहे हैं कि वे अपने पारस्परिक संबंधों को और भी प्रगाढ़ करेंगे.

गौरतलब है कि बीते बुधवार को किम जोंग-उन ट्रेन से रूस पहुंचे. उनके बारे में कहा जाता है कि शायद वे हवाई जहाज से जाना पसंद नहीं करते. पुतिन ने बहुत अच्छे तरीके से किम का स्वागत किया, लेकिन इन दोनों नेताओं का कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हुआ. इसलिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि इन दोनों नेताओं के दिमाग में क्या चल रहा है. लेकिन हां, इतना तो माना ही जा सकता है कि शायद इस मुलाकात के कुछ गहरे मायने सामने आयें.

किम और पुतिन की इस मुलाकात से यह सवाल उठना लाजमी है कि इसके मायने क्या हैं और इन दोनों के बीच आखिर क्या बात हुई होगी? सबसे ज्यादा अमेरिका इस बात के लिए परेशान होगा कि किम-पुतिन की आगे की मुलाकात का अर्थ क्या होगा. इस बात को समझने के लिए अभी हमें थोड़ा पीछे जाकर किम की बाकी मुलाकातों को देखना होगा.

क्योंकि उत्तर कोरिया को अमेरिका, चीन और दक्षिण कोरिया के बाद रूस के शीर्ष नेतृत्व से बात करने का माैका मिला है, तो जरूर इसके कुछ मायने होंगे और निकट भविष्य में वह दिखायी भी देंगे. एक तो इस बात की संभावना ज्यादा है कि अब उत्तर कोरिया के पास अमेरिका के अलावा रूस से वार्ता-समझौता करने का विकल्प खुल गया है. और दूसरा यह कि उत्तर कोरिया अपने पड़ोसी देशों से पारस्परिक संबंधों को बढ़ाने की कोशिश में है, जाहिर है कि उत्तर कोरिया अपना विस्तार करना चाहता है.

पिछले कुछ समय में हमने देखा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता किम जोंग-उन के साथ बातचीत और समझौते शुरू किये, तब उन्होंने चीन से कहा था कि वह उत्तर कोरिया के साथ समझौता-वार्ता में मदद करे. संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया पर कई चीजों को लेकर प्रतिबंध लगाये हैं. उत्तर कोरिया द्वारा मिसाइल परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र ने उस पर नये प्रतिबंध लगाये थे.

फिर भी उत्तर कोरिया परीक्षण करता रहा है और प्रतिबंधों का उल्लंघन करता रहा है. इस मसले पर अमेरिका और रूस दोनों तैयार थे और संयुक्त राष्ट्र के लगाये प्रतिबंधों के पक्ष में थे. लेकिन, जब ट्रंप और किम की मुलाकातें होने लगीं, तो उस दौरान लगने लगा था कि रूस थोड़ा साइडलाइन हो गया है. ट्रंप और किम की कुल चार मुलाकातें हुई हैं.

अरसा पहले रूस का उत्तर कोरिया से नजदीकी सिक्स पार्टी टॉक को लेकर थी, लेकिन साल 2014 में जब किम जोंग-उन उत्तर कोरिया के शीर्ष नेता बने थे, तब पुतिन ने उनके सारे पुराने ऋण माफ कर दिये थे. उसके बाद भी रूस से उत्तर कोरिया का संबंध कुछ प्रगाढ़ नहीं हुआ और किम-पुतिन की कोई मुलाकात भी नहीं हुई. यहां तक कि ट्रंप-किम की मुलाकातों और वार्ता-समझौतों के बारे में भी रूस ने कुछ नहीं कहा. लेकिन, चुप्पी का अर्थ तो होता ही है.

सिक्स पार्टी टॉक में उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के साथ चार देश- अमेरिका, रूस, चीन और जापान शामिल थे. जब उत्तर कोरिया ने तेजी से परमाणु परीक्षण करने शुरू किये, तब डोनाल्ड ट्रंप ने बौखलाकर कहना शुरू कर दिया था कि वे उत्तर कोरिया को उड़ा देंगे. लेकिन, उत्तर कोरिया ने ट्रंप की बातों की नजरअंदाज करते हुए अपनी सामरिक क्षमता का और भी विस्तार करना शुरू कर दिया. किम ने तो यहां तक कहा था कि उनके पास जो परमाणु हथियार हैं, उससे वे वाशिंगटन तक हमला कर सकते हैं.

उसी के बाद से सीधे बातचीत और वार्ता-समझौता का माहौल बना था. ट्रंप के सीधे किम से बातचीत की पहल और तमाम मुलाकाताें का यही तात्पर्य रहा है कि उत्तर कोरिया को बिना किसी शर्त पर पूरी तरह से परमाणु हथियारों को नष्ट कर लेना चाहिए, तभी उसके ऊपर से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध हट सकते हैं. उत्तर कोरिया कहता रहा है कि वह ऐसा करेगा, लेकिन इसके साथ वह यह भी चाहता है कि दक्षिण कोरिया और उसका सामरिक सहयोगी अमेरिका भी अपने परमाणु हथिायारों को नष्ट करें.

अब जब किम जोंग-उन रूस गये हैं, तो यह उम्मीद जतायी जा रही है कि उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को लेकर पुतिन से कोई बात हुई हो.

हालांकि, यह देखना होगा कि आनेवाले समय में ऐसी कोई बात होती है या नहीं, या फिर सिर्फ व्यापारिक संबंधों को ही मजबूत बनाने की बात होगी. हो सकता है कि इस मुलाकात से कोई रास्ता खुले और संयुक्त राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में यह उम्मीद की जा सकती है कि रूस यह कहे कि उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध कुछ कम किये जाने चाहिए.

किम जोंग-उन थोड़े अलग किस्म के व्यक्ति हैं. ऐसे में बाकी देशों के साथ उत्तर कोरिया के रिश्ते अगर सुधरते हैं, तो सबसे अच्छी बात यह होगी कि उस क्षेत्र में शांति आयेगी. वैश्विक अर्थव्यवस्था की हालत को देखते हुए सब मिलकर आगे बढ़ेंगे, तो सबकी आर्थिक तरक्की होगी. भारत को भी इससे फायदा होगा, क्योंकि भारत के रूस से अच्छे संबंध हैं. फिलहाल तो पुतिन और किम के अगले कदम का इंतजार करना होगा कि वे करना क्या चाहते हैं.

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