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नेताओं की यात्रा मुनाफेदार

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
चुनावातुर नेता में भय और लज्जा का सख्त अभाव होता है. वैसे भय और लज्जा हो, तो बंदा पाॅलिटिक्स में आने से पहले सौ बार सोचेगा. सोचनेवाला बुद्धिजीवी बन जाता है, बिल्कुल नहीं सोचनावाला टीवी पर एक्सपर्ट बन जाता है और सोच कर बोलने को अपनी प्रगति का विरोधी माननेवाला नेता बन जाता है.
केजरीवाल कहते थे- कांग्रेस को निबटाना है. अब कांग्रेस से कह रहे हैं- प्लीज हमें साथ लो, वरना दोनों निबट जायेंगे. प्रियंका चतुर्वेदी भूतपूर्व कांग्रेस नेता अब उस शिवसेना में हैं, जिस पार्टी के बंदों को वह गुंडा बताया करती थीं. प्रियंका चतुर्वेदी के विचार कुछ घंटों में सेकुलर से राष्ट्रवादी हो जायेंगे. शत्रुघ्न सिन्हा जी कांग्रेस में हैं, पत्नी समाजवादी पार्टी में हैं.
कांग्रेसी शत्रुघ्न सिन्हा समाजवादी पार्टी की नेता पत्नी के लिए प्रचार कर रहे हैं. खैर शत्रुघ्न सिन्हा की बात तो समझ में आती है, वह कह सकते हैं- सबका साथ, सबका विकास. शत्रुघ्न सिन्हा जी राष्ट्रीय व्यक्तित्व हैं, सबके हैं. पार्टी की सीमाएं उन्हें नहीं बांध सकतीं. वैसे ये चुनाव भी राष्ट्र की सीमाओं में कहां बंध रहे हैं. पाकिस्तान बार-बार आ रहा है.
और नेताओं की क्या कहें, पब्लिक पाकिस्तान को पीटने की बात पर ताली बजाती है, साफ पानी और ठीक सड़क की बात हो, तो पब्लिक चुप हो जाती है.
नेता भी क्या करें, जब नंबर ही पाकिस्तान को पीटने के मिल रहे हैं, तो इम्तहान में साफ पानी और ठीक सड़क का जिक्र क्यों करें. पाकिस्तान में अगर ठीक-ठाक चुनाव हों, तो हिंदुस्तान बहुत आम आये. लेकिन, पाकिस्तान में आर्मी उतनी शराफत से स्वतंत्र चुनाव होने देती है, जितनी शराफत से वह हाफिज सईद से विश्व में शांति प्रचार में लगी हुई है?
खैर पुरानी बातें याद करना और करवाना कष्ट देता है.चुनावातुर नेता को सिर्फ वोट दिखते हैं. अभी कर्नाटक में राज्य सरकार के एक मंत्री नागिन डांस कर रहे थे.नागिन डांस के गीत के क्लासिक बोल हैं- तन डोले, मेरा मन डोले, मेरे दिल का गया करार… यह मूलत: राजनीतिक गीत है, जिसमें नेता कहना चाह रहा है कि इस चुनाव की बेला में मेरा-तन डोल रहा है, तन मुहल्ले-मुहल्ले में डोल कर वोट मांग रहा है. मेरा मन डोल रहा है कि चुनाव बाद सैटिंग सही बैठ जाये, तो इस पार्टी में चला जाऊं या उस पार्टी में. और इस चक्कर में मेरे दिल का चैन, मेरे दिल का करार चला गया है कि दल बदलने के बाद भी हार गया, तो क्या होगा.
नागिन डांस तक तो ठीक है, चुनावी मौसम में कुछ शरारती मतदाता कुत्ता नाच भी कराते हैं. इसमें नेताजी से चारों पैरों पर चलने के लिए कहा जाता है और नेताजी कर गुजरते हैं. इतने भर से काम चल जाये, तो बुरा सौदा नहीं है.
क्योंकि उसके बाद तो पांच साल तक सियार, मगरमच्छ और गिद्ध बनने का लाइसेंस मिल जाता है. कुत्तत्व से गिद्धत्व की यात्रा बहुत मुनाफेवाली होती है नेताओं के लिए. और, हम पब्लिक का तो यह है भइया कि- कौन याद रखता है?
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