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विरासत बची रहे

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विख्यात नोत्र देम चर्च की ऐतिहासिक इमारत में लगी आग से दुनियाभर में गहरी उदासी का माहौल है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने पेरिस के इस चर्च को उचित ही अपने देश का ‘इतिहास, साहित्य और कल्पना’ कहा है. ऐसी इमारतें अतीत का प्रतीक होने के अलावा मनुष्य की उन भावनाओं और क्षमताओं की उत्कृष्टता को भी प्रतिबिंबित करती हैं, जिनके आधार पर हम सभ्यताओं और संस्कृतियों को गढ़ते हैं. इसीलिए जर्जर भवनों और खंडहरों को भी सहेजा जाता है.
यह सहेजना बीते हुए के प्रति आभार है और आगत के लिए उत्तरदायित्व का भाव. पेरिस के केंद्र में स्थित करीब हजार साल पुराने भवन के पुनर्निर्माण के लिए सरकार और समाज ने जो पहलें की हैं, वह प्रेरणादायी है. हमें भी अपने देश की ऐतिहासिक इमारतों के रख-रखाव और बचाव के लिए सचेत होना चाहिए. ऑस्ट्रेलिया में बसे भारतीय मूल के प्रतिष्ठित संग्रहालय विशेषज्ञ विनोद डैनियल ने निवेदन किया है कि भावी सरकार को कार्यभार संभालते ही आग से स्मारकों की सुरक्षा की व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा करनी चाहिए.
इस प्रयास में राज्य सरकारों की भी महती भूमिका है, क्योंकि हजारों इमारतों की जिम्मेदारी उनके पास भी है. विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक भारतभूमि को सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक धरोहरों की बेमिसाल पूंजी मिली हुई है.
स्मारकों से देश का कोना-कोना आबाद है. ये इमारतें हमारे इतिहास के विभिन्न काल-खंडों का अध्याय हैं, संस्कृतियों के समुच्चय और सहभागिता का उदाहरण हैं तथा पुरखों के गौरव का महाकाव्य हैं. दुर्भाग्य से हम इस विरासत की देखभाल में लापरवाह हैं. वैसे तो देशी-विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में इमारतों को देखते-सराहते हैं, पर पर्यटकों के लिए आकर्षक इमारतों की संख्या बहुत कम है. इसका एक नतीजा यह है कि कुछ स्मारकों पर हम बहुत अधिक ध्यान देते हैं, लेकिन बाकी को उनके हाल पर छोड़ देते हैं.
इतिहास बता रही इमारतों को हम नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आते. जिन पर हमारा ध्यान भी है, तो उनकी सुरक्षा का इंतजाम नहीं है. साल 2016 में दिल्ली में प्राकृतिक विज्ञान का राष्ट्रीय संग्रहालय आग में तबाह हो गया था. देश की राजधानी में होने के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका था. पुराने पुस्तकालयों और संग्रहालयों में न तो पानी की ठीक व्यवस्था है और न ही किसी संकट में अमूल्य पांडुलिपियों एवं संस्करणों को बचाने की आपात योजना है. तोड़-फोड़ और अतिक्रमण के कारण भी बड़ी संख्या में इमारतें नष्ट हो रही हैं.
धरोहरों को बचाने के लिए कानूनों की कमी नहीं है, पर बेहद कम निवेश, प्रबंधन की अक्षमता और निगरानी में लापरवाही जैसी चिर समस्याएं आड़े आ जाती हैं. नोत्र देम की आग के दो दिन बाद 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया गया है. आनेवाली पीढ़ियों के प्रति हम सबकी जवाबदेही है कि विरासती स्मारकों को आग और अन्य आपदाओं से बचाकर रखें.
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