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तेज आर्थिक वृद्धि की कोशिश

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आरके पटनायक
पूर्व सेंट्रल बैंकर
editor@thebillionpress.org
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने 4 अप्रैल 2019 को संपन्न चालू वित्तीय वर्ष के अपने पहले द्वैमासिक फैसले में नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों (0.25 प्रतिशत) की कमी कर दी. इसके दो माह पूर्व 7 फरवरी को भी इस समिति ने इस दर में इतनी ही कटौती की थी.
यानी मौद्रिक नीति के संदर्भ में समिति का रुख तटस्थ बना रहा. यह सब बाजार की प्रत्याशाओं के अनुरूप ही था, हालांकि कुछ क्षेत्रों से और भी उदारता की मांग की जा रही थी.
इस समिति ने अपना यह फैसला दो के विरुद्ध चार मतों के बहुमत से किया. रेपो दर वह दर है, जिस पर वाणिज्यिक बैंक रिजर्व बैंक से अल्पकालिक ऋण लेकर अपने ग्राहकों को ऋण दिया करते हैं. रेपो दर में कमी के लाभ स्वरूप ग्राहकों को भी बैंकों से कम ब्याज दर पर ऋण मिल जाता है.
मौद्रिक नीति समिति द्वारा रेपो में इस कटौती का उद्देश्य ‘सुस्त निजी निवेश में तेजी लाकर घरेलू वृद्धि उत्प्रेरणों को मजबूती देना’ बताया गया. इसके अलावा, इस फैसले में ये कारक भी सहायक रहे: (क) अक्तूबर 2018 से ही उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित हेडलाइन मुद्रास्फीति दर में लगातार गिरावट, जो फरवरी 2019 में 2.6 प्रतिशत पर आ गयी; (ख) वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही के लिए महंगाई अनुमानों का 2.4 प्रतिशत पर, वर्ष 2019-20 की पहली छमाही के लिए 2.9-3.0 प्रतिशत और दूसरी छमाही के लिए 3.5-3.8 प्रतिशत पर नरम बने रहना.
गौरतलब है कि महंगाई की इन दरों का अर्थ उसके औसतन चार प्रतिशत से नीचे की निर्धारित दर के अनुशासन में कायम रहना है; (ग) महंगाई दरों के कम और नरम बने रहने के अनुमानों ने अर्थव्यवस्था के नकारात्मक आउटपुट अंतर के संदर्भ में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के उपाय करने दिये. नकारात्मक आउटपुट अंतर का मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था का वास्तविक आउटपुट उसकी आउटपुट क्षमता से कम है; और (घ) रिजर्व बैंक के मुद्रास्फीति प्रत्याशा सर्वेक्षण में पिछले सर्वे की तुलना में आगामी तीन महीने एवं एक वर्ष की अवधियों के पूर्वानुमानों में 40 आधार अंकों की कमी आ जाना.
इस तरह महंगाई दर में नरमी के आकलन और अर्थव्यवस्था को विकास के एक तेज रास्ते पर ले जाने का उद्देश्य रेपो दर में इस कमी का आधार बना.
मुद्रास्फीति की उपर्युक्त प्रत्याशाओं के सामने तीन जोखिम तो अपनी जगह बनी हुई हैं: वर्ष 2019 में एल नीनो प्रभाव की संभावना, (ख) सब्जियों की कीमतें अचानक उलट जाने के खतरे, तथा (ग) निम्न ईंधन मुद्रास्फीति का अनिश्चित बने रहना.
रेपो दर में कमी को लेकर एक प्रासंगिक प्रश्न विवादास्पद रहा है, वह यह कि क्या इसके नतीजे में बैंक भी अपनी ब्याज दरों में कमी लायेंगे? जैसा रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि रेपो दर में 25 आधार अंकों की कमी के परिणामस्वरूप बैंकों ने अपनी ब्याज दरें मात्र 10 आधार अंक नीचे लायीं.
इनके अतिरिक्त अर्थव्यवस्था में निम्न कारकों को लेकर अभी ये अनिश्चितताएं भी मौजूद हैं: (क) आगामी आम चुनावों और एक नयी सरकार के गठन को लेकर अस्पष्टताएं, (ख) एक नियमित बजट का पेश होना बाकी है, (ग) सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिवाला एवं दिवालियापन संहिता से संबद्ध रिजर्व बैंक के पिछले निर्देश खारिज कर दिये जाने के बाद विनियमन संबंधी उसके अगले फैसले तथा कार्रवाइयां, (घ) कोर मुद्रास्फीति का उच्च स्तर, (च) वैश्विक अर्थव्यवस्था में संभावित मंदी के मद्देनजर विकसित एवं उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर उसका असर, (छ) निम्नतर वैश्विक वृद्धि एवं व्यापारिक अनिश्चितताओं की वजह से वित्तीय बाजारों में उठा-पटक, तथा (ज) केंद्र एवं राज्य सरकार के स्तरों पर एक कमजोर राजकोषीय परिस्थिति.
मौद्रिक नीति के माध्यम से वृद्धि को प्रोत्साहित करने की अपनी सीमाएं हैं, क्योंकि उधार लेने के लिए सरकार की सकल जरूरतें बढ़ी होने की वजह से ब्याज दरों पर दबाव बनता है, जिससे ब्याज दर गिरावट के अल्पावधि ब्याज दरों से दीर्घावधि ब्याज दरों तक संचारित होने में बाधाएं आती हैं.
सच तो यह है कि आर्थिक वृद्धि में एक सतत बढ़ोतरी को अर्थव्यवस्था में बचत के सतत बढ़ते जाने पर आधारित होना चाहिए. ऊंचा राजस्व घाटा बने रहने की राजकोषीय स्थिति अर्थव्यवस्था पर लगातार एक बोझ है. यह जब तक बना रहता है, वृद्धि जनित व्यय हेतु ऋण आधारित संसाधन की उपलब्धता समाप्त करता जाता है. इसलिए राजस्व घाटा खत्म करना बहुत जरूरी है, पर राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन अधिनियम 2018 ने राजस्व घाटा खत्म करने पर गौर नहीं किया.
ब्याज दर में कमी पर मौद्रिक नीति समिति का फैसला सर्वसम्मत नहीं रहा. फरवरी एवं अभी के दोनों फैसलों में दो सदस्यों ने यथास्थिति के पक्ष में मत दिये, पर चूंकि चार सदस्यों के मत उसमें परिवर्तन हेतु थे, अतः वैसा ही हुआ. क्या यह परिपक्वता का सूचक है? क्या बहुमत के निर्णय को सही मानना हमेशा ही उचित होता है? इन प्रश्नों पर बहस जरूरी है. लगता है हालिया अरसे में मुद्रास्फीति में आयी कमी वास्तविक की बजाय तकनीकी ही रही है, जिसके विपरीत दिशा में जाने की संभावनाएं भी मौजूद रहेंगी.
इसके अतिरिक्त, आर्थिक वृद्धि में ब्याज दर की कमी द्वारा बढ़ोतरी लाना सैद्धांतिक अधिक है, व्यावहारिक कम. ऋण वितरण के संदर्भ में बैंकिंग प्रणाली में संरचनात्मक कमजोरियां हैं, जिनका डूबत ऋणों (एनपीए) का ऊंचा स्तर भी साथ दे रहा है. वित्तीय बाजार अभी इतने परिपक्व नहीं हो सके हैं कि मौद्रिक नीति को पूरी तरह प्रतिबिंबित कर सकें. ऐसे में, यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ब्याज दरों में लायी गयीं दो लगातार गिरावटें अनुपयोगी होंगी.
यह मानते हुए कि रिजर्व बैंक का मौद्रिक नीति रुख तटस्थ रहेगा, माॅनसून सामान्य होगा और साथ ही खाद्य तथा ईंधन मुद्रास्फीति, हेडलाइन मुद्रास्फीति और औसत खुदरा मुद्रास्फीति का स्तर लगातार चार प्रतिशत की निर्धारित सीमा के अंदर ही रहेगा, अर्थव्यवस्था की रफ्तार तेज करने की कवायद विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन (यानी राजस्व घाटे की समाप्ति) मजबूत करने और श्रम सुधारों के अलावा बैंकिंग प्रणाली द्वारा ऋण वितरण की कड़ी मॉनिटरिंग पर निर्भर होगी. ब्याज दरों में कमी लाने की मार्फत मौद्रिक नीति से काम लेने पर अत्यधिक निर्भरता संभवतः ज्यादा कारगर सिद्ध न हो सके.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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