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सुराही-मटके के दिन!

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क्षमा शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार
kshamasharma1@gmail.com
गरमी आते ही फ्रिज, कूलर, एसी, ठंडे पेय की मांग बढ़ जाती है. खीरा, तरबूज, ककड़ी की बहार आ जाती है. सड़कों पर कहीं-कहीं घड़े दिखने लगते हैं. पहले रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर घड़े-सुराहियां दिखती थीं. मगर अब ऐसा कहीं-कहीं ही देखने को मिलता है. फूल-पत्तियों की डिजाइन से सजे मिट्टी के ये बरतन बहुत सुंदर दिखते थे. रेलवे स्टेशनों या बस अड्डों पर बने प्याऊ में बड़े-बड़े मटकों में पानी रखा रहता था.
रेल के सफर में लोग अपने साथ एक सुराही जरूर ले जाते थे. फिर जहां उतरते थे, सुराही को डिब्बे में ही छोड़ जाते थे. सुराही का यह पानी न केवल अपनी, बल्कि अपने साथ के भी कई यात्रियों की प्यास बुझाया करता था. सुराही का मतलब होता था, रास्ते भर ठंडा पानी मिलना. अब बोतल बंद पानी की हर जगह उपलब्धता ने रास्ते के लिए सुराही में पानी भर कर ले जाने के रिवाज को खत्म कर दिया है.
श्रवण कुमार की कथा अगर आपको याद हो, तो वह अपने माता-पिता के लिए नदी से मटके में पानी ही तो भरने गया था. घड़े में पानी भरने से जो आवाज हुई, उसे किसी पशु की आवाज समझकर दशरथ ने तीर चला दिया और श्रवण कुमार मारा गया था. पुराने जमाने में तो पैदल यात्री भी पानी की अपनी जरूरत पूरी करने के लिए घड़ा साथ में रखते थे.
लेकिन जब से फ्रिज घर-घर में आया, घड़े की उपयोगिता कम होती गयी है. फ्रिज के पानी में मिट्टी की वह खुशबू कहां, जो घड़े या मटके और सुराही के पानी में होती थी. हालांकि, अब भी कुछ लोग घड़े खरीदते हैं. बाजारों में तरह-तरह के पेंट से पुते घड़े दिखायी देते हैं. बहुतों में नल भी लगे होते हैं. लेकिन सुराहियां शायद ही कहीं दिखायी देती हैं.
दिल्ली में मथुरा रोड पर पुराने किले के पास 784 साल पुराना सूफी संत हजरत शेख अबू बकर की दरगाह है. अकसर गुजरते हुए यहां के पेड़ों पर मटके लटके दिखायी देते हैं. इसे मटका पीर के नाम से भी जाना जाता है.
इन दिनों मिट्टी के घड़े तो कहीं-कहीं दिखायी दे भी जायें, लेकिन सुराहियां तो कम ही दिखायी देती हैं. सुराहीदार गरदन की उपमा महिलाओं के लिए दी जाती थी, लेकिन अब सुराही ही नहीं बची, तो कोई नयी उपमा ढूंढी जानी चाहिए. सफर में तो अब इनका की काम नहीं रहा. बोतल बंद पानी के व्यवसाय ने इन्हें खदेड़ दिया. युवाओं को तो यह मालूम भी नहीं होगा कि कभी रास्ते में पानी की जरूरत सुराहियां पूरी करती थीं.
पहले के दौर में गरमी आते ही घर में सबसे पहले घड़ा खरीदा जाता था. जब उसे धोकर उसमें पानी भरा जाता था, तो मिट्टी की खुशबू सारे घर में फैल जाती थी.
नये के फेर में अकसर हम बहुत-सी कलाओं को भुला देते हैं. कुम्हार की कला भी वैसी ही है. चाक पर चलते कुम्हार के हाथ और किसी जादू की तरह कभी मटका बनना, कभी सुराही, कभी कटोरा, कभी मिट्टी का तवा, कभी कुल्हड़. जिसने भी यह नजारा देखा है, वह उसे कभी भूल नहीं सकता.
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