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Home Opinion खुशामद कर बुलंद इतनी

खुशामद कर बुलंद इतनी

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सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshka- t@gmail.com
‘मार्च’ का शाब्दिक अर्थ भले ही शुरू करना, कूच करना, प्रयाण करना हो, पर हकीकत में उसका ताल्लुक रुकने, खत्म करने, बंद करने से है, जिसे ‘क्लोजिंग’ भी कहते हैं. सरकार का साल अप्रैल से शुरू होकर मार्च में खत्म होता है.
जरूर इसके पीछे कोई राज होगा, जिसे सरकार ही जानती होगी, पर उसे सार्वजनिक करना शायद सुरक्षा-हितों के खिलाफ होगा. ‘एको‍‌‍‍ऽहं’ सरकार अनेक दफ्तरों के रूप में ‘बहुस्याम’ होती है. निराकार सरकार के इन दफ्तरों में साकार विराजते हैं दफ्तरों को सुशोभित करनेवाले हर प्रकार के उसके बंदे.
जिस प्रकार पंचतत्वों से मानव-शरीर निर्मित होता है, उसी प्रकार दफ्तरों के निर्माण में भी पांच परम शक्तियां प्रमुख भूमिका निभाती हैं- साहब, अकाउंटेंट, क्लर्क, स्टेनो और चपरासी. इनमें से साहब साहब होता है, बाकी उसके बंदे. कबीर ने ठीक ही लिखा है- साहब सों सब होत है बंदे ते कछु नाहिं! बंदों की सरफरोशी, बिना उनके यह गाये भी कि सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, कब हो जाये, कहा नहीं जा सकता.
साहब सेमिनार बुलाता है, साहब कांफ्रेंस करता है, साहब कोर ग्रुप बनाता है. साहब की संस्तुति के बाद ही बंदे फील्ड में जाते हैं. फील्ड में जानेवाले फील्ड में ही भटकते रहते हैं. असली लाभ तो उनको मिलता है, जो हेडक्वाॅर्टर में ही जमे रहते हैं. पूजा वही जाता है, जो साहब के चक्कर लगाता है. इस दुनियादारी का बोध सबसे पहले गणेश जी को हुआ था, जिन्होंने दुनिया का चक्कर माता-पिता की परिक्रमा करके ही लगा लिया था.
साहब की भी परिक्रमा लगाती रहनी पड़ती है बंदों को, उनकी नजरों के सामने बने रहना होता है. बंदे को घर-बार यानी घर और बाहर दोनों चलाना पड़ता है अपने साहब का. साहब खुश, तो बंदे का भी कारोबार चलता रहता है. यह तो सर्वविदित है कि आजकल ब्रांडेड से ज्यादा असेंबल्ड की पूछ होती है.
फील्ड में जानेवाला स्टाफ फील्ड में भी शिकार कर लेता है, पर तभी तक, जब तक साहब चाहें. साहब को जैसे ही आभास होता है कि फील्ड में वर्षा हो रही है, खासकर धन की, तो स्टाफ को वापस बुला लेता है.
साहब को गच्चा नहीं देना चाहिए, नहीं तो वे तो कच्चा खा जाते हैं. साहब की शक्ति-पूजा ‘जी सर’, ‘यस सर’, ‘एक्सक्यूज मी सर’, ‘पार्डन सर’ और ‘थैंक्यू सर’ जैसे मंत्रों से की जाती है.
साहब का असली रुआब मार्च में ही देखने को मिलता है. मार्च यानी बंदों की गति, प्रगति, सद्गति या अधोगति का संभावित माह. दुर्गति को प्राप्त नहीं होते वे, जो साहब को देखते ही ‘शोभित कर नवनीत लिए’ की मुद्रा धारण कर लेते हैं.
बापू ने भी दांडी मार्च के लिए मार्च महीना तय किया था. सोचिए, अगर वे कोई और महीना चुनते, तो उसे ‘दांडी मार्च’ कहना मुश्किल हो जाता. मातहतों को भी मार्च में ही दांडी-मार्च करना होता है, अपनी सीआर लिखवानी होती है साहब से, जिसके लिए कहा गया है- खुशामद कर बुलंद इतनी कि हर सीआर से पहले, साहब बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है?
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