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भारत-अमेरिका आर्थिक संबंध

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प्रो एसपी शाही
प्रिंसिपल, एएन कॉलेज, पटना
डॉ सुमित झा
रिसर्च फेलो, एमएकेएआईएएस, कोलकाता
sumitjha83@gmail.com
चीन एक ओर जहां अमेरिका से जल्द ही व्यापार युद्ध खत्म करने का प्रयास कर रहा है, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रति अमेरिकी व्यापार नीति को और अधिक कठिन करने का संकेत दिया है. वास्तव में, इसी महीने की शुरुआत में ट्रंप सरकार ने भारत एवं टर्की को द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिकी नीति के अंतर्गत मिलनेवाली विशेष सुविधा को खत्म करने की बात कही है. ट्रंप सरकार ने यह भी कहा है कि दोनों देश अमेरिका के नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं.
यह पहली बार नहीं है, जब भारत के खिलाफ ट्रंप सरकार ने इतना कठोर कदम उठाया है. ट्रंप के सत्ता में आने के साथ ही, अमेरिका का चीन, कनाडा, मेक्सिको और अन्य देशों के साथ बढ़ रहे व्यापार घाटे में कमी लाना राष्ट्रपति ट्रंप का मुख्य उद्देश्य रहा है.
इसी परिप्रेक्ष्य में, ट्रंप सरकार के दोबारा एच-1बी वीजा हासिल करने की प्रकिया को अधिक जटिल करने का निर्णय भारत और अमेरिका के बीच गतिरोध का एक प्रमुख विषय बन गया है. उदाहरण के लिए, अमेरिका के होमलैंड और सुरक्षा विभाग ने यह घोषणा की है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर डिग्री हासिल किये लोगों को एच-1बी वीजा में वरीयता दी जायेगी.
इस पहल के कारण भारत के इंजीनियरों को वीजा मिलना बहुत मुश्किल हो जायेगा, क्योंकि भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियां सामान्यतया स्नातक डिग्री प्राप्त लोगों को नौकरी देती हैं. अमेरिका के सिटीजनशिप और इमीग्रेशन सर्विसेज ने 15 दिनों के अंदर 1,225 अमेरिकी डॉलर देकर एच-1बी वीजा लेने की विशेष व्यवस्था को भी रोक दिया है.
ट्रंप सरकार ने इस बात पर भी नाराजगी जतायी है कि अमेरिका-भारत व्यापार घाटा 27.3 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है. इसके साथ ही, अमेरिका द्वारा आयात शुल्क बढ़ाने के निर्णय ने भारत की चिंता बढ़ा दी है.
वास्तव में, इसकी शुरुआत 2018 के शुरू में ही हो गयी थी, जब ट्रंप सरकार ने एल्युमिनियम और स्टील पर 10 एवं 25 प्रतिशत आयात शुल्क बढ़ा दिया था. उसी साल जून के महीने में ट्रंप से भारत ने दोबारा हार्ले डेविसन मोटरसाइकिल पर लगाये गये उच्च आयत कर का मुद्दा उठाया. अक्तूबर 2018 में ट्रंप ने भारत को ‘टैरिफ किंग’ तक कह डाला और अमेरिका ने 50 भारतीय सामानों पर दी जा रही टैक्स पर छूट को खत्म कर दिया.
भारत के विरुद्ध अमेरिका के कदम को सही बताते हुए ट्रंप सरकार ने इस बात पर बल दिया है कि भारत सरकार ने अब तक सामान प्रतिस्पर्धी बाजार उपलब्ध कराने के लिए कोई सकारात्मक पहल नहीं की है.
अमेरिकी डेरी फर्म्स से जुड़े लोगों का कहना है कि उच्च आयात कर के कारण उनके सामानों को भारतीय बाजार में समान अवसर नहीं मिलता है. अमेरिका इससे भी आहत हुआ है कि इस साल भारत ने मोबाइल फोन, जूता सहित कई अन्य वस्तुओं पर आयात कर बढ़ा दिया है.
इसके साथ ही, ट्रंप सरकार की चुनावी वादों को पूरा करने की चुनौती, भारत का रूस के साथ एस-400 मिसाइल खरीदने की संधि एवं अन्य कई कारण भी हैं, जिनकी वजह से अमेरिका ने भारत के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार किया है.
अमेरिका का जो भी तर्क हो, इसमें कोई दो राय नहीं है कि ट्रंप सरकार के इन कदमों ने भारत के लिए परेशानी बढ़ा दी है. इसे इस बात से समझा जा सकता है कि भारत अमेरिका द्वारा व्यापार में तरजीह देनेवाली नीति का एक प्रमुख लाभार्थी रहा है. इसी नीति के अंतर्गत साल 2017 में भारत ने अमेरिका को 5.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया.
अब अनुमान है कि अमेरिका की कठोर व्यापार नीति की वजह से भारत का लघु एवं मध्यम उद्यम प्रभावित होगा. आभूषण, चमड़ा, प्रसंस्कृत भोजन जैसे क्षेत्रों पर अमेरिका की नीति का विशेष नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. ऐसा माना जा रहा है कि कई किस्म के चावल के निर्यात पर भी बुरा असर पड़ेगा.
भारत ने अभी तक अमेरिका से आनेवाले सामानों पर प्रस्तावित आयात कर नहीं बढ़ाया है, बल्कि हार्ले डविसन मोटरसाइकिल पर 50 प्रतिशत आयात कर घटा दिया है.
भारत व्यापार संबंधी अमेरिकी चिंता को सुलझाने के लिए भी तैयार है. हालांकि, भारत एक विकासशील देश है और अमेरिका एक विकसित देश है. और दोनों देशों के आर्थिक आकार में भी अंतर है. फिर भी, इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ सालों में द्विपक्षीय संबंध बहुत मजबूत हुआ है. सुरक्षा, ऊर्जा, विज्ञान और तकनीक एवं अन्य क्षेत्र में नयी दिल्ली और वाशिंगटन ने अपने आपसी सहयोग को प्रगाढ़ किया है.
अत: इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत की आर्थिक परिस्थिति को समझते हुए ट्रंप सरकार जल्द ही भारत के प्रति अमेरिका की व्यापार नीति में कोई सकारात्मक बदलाव लायेगी.
इसके साथ ही, भारत को ट्रंप सरकार के रवैये को देखते हुए एक मजबूत नीति बनाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि आगे आनेवाले समय में किसी कारण उत्पन्न हुई विपरीत परिस्थितियों में भी भारत के आर्थिक हितों की रक्षा हो सके. निश्चित रूप से ट्रंप से, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से, यूरोप और अफ्रीका महाद्वीप के साथ भारत को अपने आर्थिक संबंध को और अधिक घनिष्ट बनाने का प्रयास करना चाहिए.
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