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खतरनाक चीनी खेल

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सुरक्षा परिषद् में चीन ने आतंकी सरगना मसूद अजहर की फिर तरफदारी कर यह साबित कर दिया है कि उसे दक्षिण एशिया के अमन-चैन की कोई चिंता नहीं है. बीते एक दशक में उसने चौथी बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भावनाओं के उलट जैशे-मोहम्मद के सरगना का बचाव किया है.
कभी तकनीकी कारणों का हवाला देकर और कभी ठोस सबूतों की मांग कर चीन न सिर्फ सच से परहेज कर रहा है, बल्कि वह पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर आतंकवाद को पालने-पोसने की कोशिश कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न वैश्विक मंचों पर भारत ने बार-बार साबित किया है कि पाकिस्तान की सरकार और सेना आतंकी एवं चरमपंथी गिरोहों के माध्यम से उसके विरुद्ध छद्म युद्ध का संचालन कर रही हैं.
भारत को अशांत करने के लिए आतंकवाद और अलगाववाद का उपयोग पाकिस्तान की विदेश और रक्षा नीति का हिस्सा है. एक ओर दुनियाभर में भारत को समर्थन मिलता रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन हमेशा पाकिस्तान के पैरोकार की भूमिका निभा रहा है. चीन अपने देश में तो आतंकी तत्वों से बहुत कठोरता से निपटता है, पर दक्षिण एशिया में वह इनका उपयोग कर अपने आर्थिक और सामरिक हितों को साधने का प्रयास कर रहा है.
चीन के झिनजियांग प्रांत में स्वायत्त क्षेत्र होने के बावजूद नागरिक अधिकारों की अवहेलना करते हुए हजारों लोगों को जेलनुमा शिविरों में रखा गया है, जहां उन्हें सरकारी विचारधारा और नीतियों की घुट्टी पिलायी जाती है. आतंकियों और अलगाववादियों को कारावास और मृत्युदंड दिया जाता है.
चीनी सरकार की नीति संगठित आतंकवाद में बदलने से पहले ही कट्टरपंथ को समाप्त कर देने की है. इसके लिए वह तीन दशकों से अफगानिस्तान और पाकिस्तान के आतंकी गिरोहों से संपर्क कर उग्यूर आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर बंद कराने और बाहरी मदद को रोकने की कोशिश करता रहा है.
लगभग दो दशक पहले चीन ने आधिकारिक तौर पर तालिबान के मुखिया मुल्ला उमर से बातचीत की थी और झिनजियांग में हमले नहीं करने की शर्त पर उग्यूर आतंकियों को तालिबानियों की तरफ से लड़ने की छूट दी थी. पाकिस्तान में चीन की अनेक परियोजनाएं चल रही हैं और वहां बड़ी संख्या में चीनी कामगार भी हैं.
अपने निवेश और लोगों की सुरक्षा के लिए भी वह पाकिस्तान का साथ दे रहा है. अफगानिस्तान में तालिबान को सत्ता में हिस्सेदार बनाने की कोशिशों पर चीन का जोर भी इसी नीति का एक पहलू है. चीन के लिए मसूद अजहर कितना महत्वपूर्ण है, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उसके मुख्य ठिकाने बहावलपुर में बड़ा सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जा रहा है.
इस्लामिक सहयोग संगठन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसे मंचों पर उसे पाकिस्तान की आवश्यकता भी है, जहां चीन की सदस्यता नहीं है. यह बेहद चिंताजनक है कि पाकिस्तान की तरह चीन भी अपने हितों को पूरा करने की कोशिश में आतंकवाद को सहयोगी बना रहा है.
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