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सामाजिकता और शिक्षा व्यवस्था

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सन्नी कुमार
टिप्पणीकार
sunnyand65@gmail.com
यह परीक्षाओं का समय है. कुछ बोर्ड की परीक्षाएं हो रही हैं, तो कुछ की होनेवाली हैं. इसके बाद आयेगा परीक्षा परिणाम का दौर और उससे जुड़ी तमाम आकांक्षाओं के बनने-बिगड़ने का समय. विरोधाभास यह है कि एक तरफ आजकल बहुतायत में विद्यार्थियों को 95 से 100 फीसदी के बीच अंक प्राप्त हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि ये बच्चे देश-काल की जमीनी हकीकत से बहुत कम वााकिफ होते हैं.
आखिर ऐसा क्यों है? आखिर शिक्षण प्रणाली का सामाजिकता से कट जाने के पीछे क्या वजहें हैं? इसकी दो मुख्य वजहें हैं, जो एक-दूसरे से परस्पर जुड़ी हुईं हैं. पहला, पूरी शिक्षण प्रणाली का ‘स्कूल’ जैसे औपचारिक संस्थान तक सिमट जाना और इसी से जुड़ा हुआ दूसरा कारण इस स्कूली शिक्षा का एक ऐसे पाठ्यक्रम पर आश्रित होना, जो अपनी क्षमता पर स्थानीयता और सामाजिकता से कटा हुआ है.
उदारवादी जीवन शैली का प्रभुत्व स्थापित होने के साथ ही एकल परिवार का चलन बढ़ा और इस प्रकार बचपन के ‘सामुदायिक जीवन’ का दायरा सीमित होता गया. नौकरीपेशा अभिभावक, छोटा परिवार और गिनती के पड़ोसी के कारण बच्चों का समाजीकरण भी इस छोटे दायरे में ही विकसित होने लगा.
सामाजिक जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव तथा विभिन्न आयुवर्ग, लिंग, और अलग पृष्ठभूमि के व्यक्तियों से परस्पर संवाद की कमी से बच्चों का अपनी दुनिया से स्वाभाविक जुड़ाव बाधित हो गया. इस कमी की पूर्ति का पूरा भार स्कूल पर डाल दिया गया. समाज ने अपने बच्चों की सामाजिक परवरिश का लगभग संपूर्ण हिस्सा स्कूल और ट्यूशन को सौंप दिया, जो अपनी अंतर्निहित संरचनात्मक दोष के कारण इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल रहे.
भारतीय शिक्षा व्यवस्था में निर्धारित पाठ्यक्रम और उस पर आधारित परीक्षा जहां स्कूली बच्चों में अधिक से अधिक सीखने की प्रवृत्ति को बाधित करती है, वहीं स्कूली चारदीवारी बच्चों को प्रत्यक्ष सामाजिक अनुभव से वंचित करते हैं.
इस प्रकार पूरी शिक्षा का मूल्यांकन तय पाठ्यक्रम को तैयार करने और इस आधार पर होनेवाली परीक्षा में अच्छे नंबर लाने पर केंद्रित हो जाता है. बच्चे, शिक्षक और अभिभावक सभी इस बात के लिए मेहनत करते हैं कि उन्हें अच्छे अंक प्राप्त हो जायें, न कि इस पर कि शिक्षा बच्चों को जिज्ञासु और नवाचारी बनाये. एक समय के बाद यह शिक्षा अर्थव्यवस्था से लेकर जीवन के विविध क्षेत्रों के लिए बेहद अनुपयोगी सिद्ध हो जाती है.
इस दोषपूर्ण प्रक्रिया को पाठ्यक्रम का स्वरूप और सघन कर देता है. दरअसल, इस तरह का पाठ्यक्रम हमारे बच्चों को देश की चुनिंदा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो तैयार कर सकता है, लेकिन इसकी सार्वभौमिकता बच्चों को निश्चित ही अपनी स्थानीयता से काट देता है.
एकदम सूखे प्रदेश में रहनेवाले बच्चों को बाढ़ नियंत्रण की विधियां समझाकर हमारी शिक्षा व्यवस्था किन लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहती है, इस पर एक बार फिर से हमें विचार करने की जरूरत है.
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