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ट्रंप का ट्रेड वार

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चीन के साथ व्यापारिक दरों पर भिड़े अमेरिका ने भारत से आयातित वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने का संकेत दिया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कहते रहे हैं कि एक तरफ भारत से आनेवाली चीजों पर अमेरिका आयात शुल्क नहीं लगाता, लेकिन भारत अमेरिकी उत्पादों पर भारी शुल्क वसूलता है.
भारत फिलहाल 5.6 बिलियन डॉलर मूल्य की वस्तुएं अमेरिका को निर्यात करता है, जिनके ऊपर शुल्क नहीं लगाये जाते हैं. ट्रंप प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि के कार्यालय ने आरोप लगाया है कि भारत ने कई ऐसे अवरोध खड़े किये हैं, जिनसे अमेरिकी वाणिज्य पर नकारात्मक असर पड़ता है. लेकिन, सच्चाई इससे अलग है.
असलियत तो यह है कि पिछले तीन दशकों में भारत ने शुल्कों में भारी कटौती की है. वर्ष 1991-92 में दरें 150 फीसदी तक हुआ करती थीं, जो 1997-98 में घटकर 40 फीसदी हो गयीं. यह सिलसिला लगातार जारी रहा और 2004-05 में दरें 20 और 2007-08 में 10 फीसदी के स्तर तक आ गयीं. विश्व व्यापार संगठन के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय दरों का औसत 13 फीसदी है.
इतना ही नहीं, भारत की कोशिश इन्हें आसियान की औसत दर पांच फीसदी तक लाने की है. दरअसल, ट्रंप प्रशासन संरक्षणवादी नीति पर आगे बढ़ रहा है, जिसके तहत ट्रंप आयात को हतोत्साहित कर घरेलू उद्योग और बाजार को मजबूत करना चाहते हैं. भारत ने स्पष्ट किया है कि हमारे शुल्क विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुकूल हैं. भले ही सरकार की ओर से कहा गया है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा दरों को बढ़ाने से भारतीय निर्यात पर कोई आंच नहीं आयेगी और सिर्फ करीब 200 मिलियन डॉलर के ‘वास्तविक लाभ’ पर ही असर पड़ेगा, लेकिन हमारे सामने चीन का उदाहरण है.
राष्ट्रपति ट्रंप के व्यापार युद्ध से चीनी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है और दोनों देश संतुलित दरों को तय करने के लिए बातचीत कर रहे हैं. अमेरिका ने चीन को 90 दिनों का समय दिया था, लेकिन पिछले शुक्रवार को इसकी समय-सीमा बीत जाने के बाद भी राष्ट्रपति ट्रंप ने दरों में बढ़ोतरी नहीं की है. स्पष्ट है कि दोनों देशों की बातचीत सही दिशा में जा रही है.
भारत भी इस खींचतान पर अमेरिका के संपर्क में है और द्विपक्षीय हितों के मद्देनजर उम्मीद की जा सकती है कि बातचीत से कोई समुचित समाधान निकल आयेगा. दोनों देशों के बीच तनातनी में एक कारक भारत द्वारा प्रस्तावित इ-कॉमर्स के नये नियम भी हैं. भारत आयात की तुलना में अमेरिका को निर्यात अधिक करता है. अमेरिकी सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2017 में भारत के साथ उनका व्यापार घाटा 27.3 बिलियन डॉलर रहा था.
चूंकि संरक्षणवाद ट्रंप प्रशासन का नीतिगत आधार है, सो वे इस अंतर को कम करने की कोशिश कर रहे हैं तथा इसके लिए भारतीय बाजार में अपनी पहुंच को आसान बनाना चाहते हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव और आंतरिक आर्थिकी को पटरी पर बनाये रखने के लिए भारत भी अपने निर्यात के स्तर को बरकरार रखने की कोशिश करेगा.
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