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कितने सबूत चाहिए

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पुलवामा हमले में पाकिस्तान का हाथ होने के आरोप पर प्रधानमंत्री इमरान खान सबूत मांग रहे हैं. चीन की आधिकारिक मीडिया भी ऐसा ही कह रही है. साफ जाहिर है कि न सिर्फ दोनों देश आतंकवाद को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं, बल्कि मसूद अजहर जैसे सरगनाओं को उनका संरक्षण भी मिलता रहेगा.
क्या पाकिस्तान और चीन की सरकारें इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं कि मसूद अजहर की रहनुमाई में जैशे-मोहम्मद भारतीय संसद, पठानकोट सैनिक ठिकाने, जम्मू-कश्मीर विधानसभा और पुलवामा में सुरक्षाबलों के काफिले पर हमले कर चुका है? क्या इमरान सरकार और उनकी सेना की शह के बगैर वह भारत के खिलाफ आतंकवादियों और आत्मघाती हमलावरों को तैयार करने तथा हमलों की साजिश रचने के लिए उनकी धरती का इस्तेमाल कर रहा है? क्या चीन के पास पाकिस्तान में सक्रिय उन गिरोहों की जानकारी नहीं है, जो खुलेआम भारत को तबाह करने के लिए जलसे करते हैं?
पिछले साल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा तैयार की गयी वैश्विक आतंकियों की सूची में अकेले पाकिस्तान से 139 नाम शामिल हैं. इनमें मुंबई हमले की साजिश रचनेवाला हाफिज सईद और उसके अनेक गुर्गे भी हैं. लश्करे-तैयबा और उससे संबद्ध संगठनों के नाम भी हैं.
मसूद अजहर का जैशे-मोहम्मद भी आतंकी गिरोह माना गया है. इनके अलावा ईरान और अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान के अल्पसंख्यक तबकों पर हमलावर संगठनों को भी इस सूची में रखा गया है. भारत सीधे तौर पर दोनों देशों से तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान-समर्थित आतंकी गतिविधियों की जानकारी साझा करता रहा है.
इन जानकारियों में खतरनाक तस्करों तथा खालिस्तानी खाड़कुओं के उल्लेख भी हैं. पाकिस्तान और चीन की सरकारें जान-बूझकर इन सबूतों से आंखें चुरा रही हैं. खुद इमरान सरकार के मंत्री हाफिज सईद जैसे तत्वों के साथ सार्वजनिक आयोजनों में भाग लेते रहे हैं.
पुलवामा हमले के एक दिन पहले ईरानी सैनिकों के एक काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ था. पाकिस्तान द्वारा तालिबानियों से मिलीभगत करने पर अफगानिस्तान ने फिर से संयुक्त राष्ट्र में शिकायत की है. अमेरिका और अनेक यूरोपीय देश सीधे तौर पर पाकिस्तान पर बरसों से आतंकवाद को प्रश्रय देने और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई कमजोर करने का आरोप लगा चुके हैं.
इस कारण अमेरिका ने तो आर्थिक और सामरिक मदद भी रोक दी है. कश्मीर, अफगानिस्तान और ईरान समेत इस पूरे इलाके में पड़ोसी देशों में हिंसा, आतंक और अलगाववाद को बढ़ावा देना पाकिस्तान की रक्षा और विदेश नीति का मुख्य हिस्सा रहा है.
यह विडंबना ही है कि पहले अमेरिका और अब चीन अपने स्वार्थों के कारण इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे हैं. इस स्थिति को बदलने के लिए सुरक्षा बंदोबस्त को पुख्ता करने के साथ भारत को कूटनीतिक प्रयासों को तेज करना होगा.
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