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मौत का तांडव

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उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और उत्तराखंड के हरिद्वार में जहरीली शराब से मरनेवालों की संख्या लगभग सवा सौ पहुंच चुकी है. इस संदर्भ में बड़ी संख्या में संदिग्ध आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है और कुछ अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई हुई है.
विशेष जांच दल से घटना की जांच के आदेश भी जारी हुए हैं. ठीक ऐसे ही कदम देश के उन हिस्सों में भी उठाये जाते रहे हैं, जहां पहले जहरीली शराब से मौतें हुई हैं.
जांच और सजा देने की प्रक्रिया इतनी धीमी गति से चलती है कि शराब के नाम पर जहर बेचने का कारोबार कर रहे अपराधियों का हौसला बुलंद रहता है. बिहार में 2012 में हुई एक घटना में निचली अदालत में ही दोष सिद्ध होने में छह साल का समय लग गया. बंगाल में 2011 में 172 की मौत के मामले में भी पिछले साल सजा दी जा सकी.
वर्ष 1980 में हरियाणा में हुई ऐसी ही वारदात का मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में 2017 में पूरा हुआ. यह भी अजीब बात है कि इन मामलों में सरकारी अधिकारियों को निलंबन और स्थानांतरण जैसी मामूली प्रशासनिक सजा ही दी जाती है. जिन राज्यों में शराबबंदी है, वहां भी चोरी-छुपे बड़ी मात्रा में शराब की आपूर्ति होती है. ऐसी भी घटनाएं होती हैं, जब पकड़ी गयी शराब पुलिस के कब्जे से बाजार में चली जाती है.
उल्लेखनीय है कि जहरीली शराब के हर मामले में एक-दो खतरनाक रसायनों की मिलावट का मामला सामने आता है. क्या प्रशासन के लिए इसका पता लगाना बहुत मुश्किल है कि इनकी खरीद-बिक्री में कौन लोग शामिल हैं? बिना आबकारी और पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत के ऐसा अवैध धंधा चलाया ही नहीं जा सकता है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस धंधे को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है. एक तो इन त्रासदियों में लोगों की मौत होती है, वहीं अवैध शराब आबादी के एक हिस्से को और गरीब एवं बीमार बना रही है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, 2005 से 2016 के बीच भारत में प्रति व्यक्ति शराब का उपभोग दोगुना हुआ है. शराब पीने के सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य-संबंधी दुष्परिणाम भयानक हैं. इस समस्या को अन्य प्रकार के नशीले पदार्थों के कारोबार और लत के साथ जोड़कर देखें, तो एक भयावह स्थिति सामने आती है. नशे की आदत पुरुषों, खासकर युवाओं, में है.
पिछले महीने केंद्र सरकार ने इस समस्या से जूझने के लिए साढ़े पांच साल से लंबित नीतिगत प्रारूप की जगह एक पांच-वर्षीय कार्रवाई योजना बनायी है. इसके तहत राज्य सरकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं की साझेदारी में जागरूकता फैलाने, नशीले पदार्थों के व्यापार पर रोक लगाने तथा लत के शिकार लोगों के पुनर्वास के व्यापक प्रयास किये जायेंगे.
यह एक सराहनीय पहल है, किंतु यह आशंका भी है कि राजनीतिक इच्छा-शक्ति की कमी तथा लचर प्रशासनिक रवैये के कारण इस योजना की नियति भी पहले चलाये गये कार्यक्रमों की तरह असफलता के रूप में न हो.
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