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पांखुरी-पांखुरी मुस्कुराता वसंत

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कविता विकास
लेखिका
kavitavikas28@gmail.com
प्रकृति जिस समय अपने चरमोत्कर्ष पर होती है, उसी समय जीवन का उदात्त काल होता है. वसंत वनस्पति के संवत्सर ताप का अत्यंत मनमोहक पुरश्चरण है. प्रकृति के सान्निध्य में मानव चेतना का विकास हुआ है.
क्षितिज के उस पार से वासंती विभव से आप्यायित वसुंधरा को पुलक स्पर्श देने के लिए भुवन भास्कर विशेष ऊर्जा से भरे होते हैं, जो मकर संक्रांति के बाद से दिखायी देने लगता है. खेतों में सरसों खिलने लगती है. मलय ज्यों ही कलियों को छूता है, पांखुरी-पांखुरी मुस्कुराने लगती है.
परिवर्तन बाहरी है, पर मनुष्य और प्रकृति में आंतरिक एकता है. निराला का वसंत बोध ईश्वरीय है. पुण्य श्लोक रचने के लिए प्रेरित करनेवाला काल है.
कवि हृदय को मुखरित करनेवाला काल. त्रिपुरासुर के विनाश के लिए जब कामदेव ने योगिराज शिव की समाधि भंग करनी चाही तो उसे वसंत का सहारा लेना पड़ा. जो वसंत कामदेव का सहायक है, वही जीवन में रत होने के लिए मनुष्य को प्रोत्साहित करता है और वही रंग दे वासंती चोला में आत्मोत्सर्ग के लिए भी प्रेरित करता है. सरस्वती का आह्वान सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजती हुई परंपरा का द्योतक है. वरद साहित्य और संस्कृति की वरदायिनी वागीश्वरी सरस्वती वसंत की शोभा में चार चांद लगा देती हैं.
आम्र मंजरियों का पहला चढ़ावा श्वेत पद्म पर विराजमान सरस्वती को अर्पित होता है, ताकि देश की संतति परंपरा आम्र वृक्षों की शाखाओं की तरह अपने यश का चतुर्दिक विकास कर सके. वीणावादिनी के पुस्तक और वीणा धारण करने का मतलब यही है कि ज्ञान का क्षेत्र संकुचित नहीं रहे. साहित्य और संगीत सृजनात्मकता बढ़ाते हैं और मधुरम जीवन का पर्याय बनते हैं. इसी मधुरता का विस्तार है वसंत ऋतु. वसंत का आगमन वन, नदी, पोखर, जीव-जंतु, मकरंद-पराग को प्रफुल्लित करता है.
वसंत मुक्ति का प्रतीक है. तभी तो जब कली फूल बनती है, तब अपनी संकीर्णता से मुक्ति पा जाती है. वसंत का ध्येय भी यही है. यह जीवन, मुक्ति और सौंदर्यानुभव तीनों रूपों में लोक को समर्पित है.
साहित्य, संगीत और स्वर की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती काल वृंत के सबसे सुंदर वसंत रूप में जब पद्मासन पर विराज हो धरती पर पहुंचती हैं, तब वासंतिक छटा अपने सर्वोत्तम शृंगार में होती है. सरस्वती श्वेतांबरा हैं, श्वेत मोक्ष और सात्विकता का प्रतीक हैं.
वसंत स्वाभाविक है और प्रकृति अनंत. वसंत केवल प्रकृति का उत्सव नहीं, समस्त ब्रह्मांड का उत्सव है. स्वर ईश्वर है और ईश्वर आनंद है. आनंद का कोई एक स्रोत नहीं है. यह एक रहस्यमय शब्द है.
इसे न शब्दों में बांध सकते हैं और न सीमाओं में. महंत इस आनंद की अनुभूति पद्मिनी के खिलने में करता है, तो कवि आम्र मंजरियों के रिसाव में. खिलना, फूलना, उड़ना, चहकना और हंसना उल्लास है. यही उल्लास वसंत है. प्रकृति में जो राग है, वही मन का राग बन जाता है. चारों तरफ बस प्यार ही प्यार छलकने लगता है.
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