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निर्धनता और विषमता

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ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के कुछ सर्वाधिक धनिकों के हाथ में धन सिमटता जा रहा है और बड़ी आबादी की संपत्ति घट रही है. लेकिन, धरती के सबसे अमीर लोगों में शुमार बिल गेट्स का मानना है कि गरीबी लगातार घट रही है.

हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई के बारे में रिपोर्ट के विश्लेषण को खारिज करते हुए कुछ जानकारों ने भी ऐसा कहा है. गेट्स ने कुछ आंकड़ों का हवाला दिया है, जिनमें कहा गया है कि 1820 में दुनिया की 94 फीसदी आबादी गरीबी के चंगुल में थी, पर अब सिर्फ 10 फीसदी लोग गरीब हैं. मैक्स रोजर के अध्ययन को गेट्स के अलावा अनेक विद्वानों ने भी उल्लिखित किया है. लेकिन, लंदन विवि के प्रोफेसर जैसन हिकेल और कुछ अन्य जानकारों का कहना है कि यह आंकड़ा भ्रामक है, क्योंकि 1981 के बाद से ही गरीबी से जुड़े सही तथ्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू हुई है और किसी भी आकलन को 1820 तक ले जाना बेमतलब है.

इन दो सौ सालों के इतिहास के दो प्रमुख कारकों का ध्यान रखना जरूरी है. एक, इस अवधि में बहुत बड़ी आबादी का रुपये-पैसे पर आधारित लेन-देन से परिचय हुआ, और दूसरा, इसी दौरान दुनिया का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के माध्यम से व्यापक आर्थिक और वित्तीय दोहन का शिकार हुआ.

भारत इसका बड़ा भुक्तभोगी रहा है. औपनिवेशिक दौर से पहले कई संसाधनों पर लोगों का साझा अधिकार होता था. औपनिवेशिक और उत्तर-उपनिवेशिक शासन-तंत्रों में आबादी के बड़े हिस्से को वेतन-भत्ते के बदले श्रम बेचने के लिए मजबूर कर दिया.

रोजर का विश्लेषण उन लोगों को गरीब मानता है, जो 1.90 डॉलर रोजाना से भी कम कमाते हैं. इसका मतलब यह हुआ कि जो इससे थोड़ा ज्यादा कमाने लगे, तो उसे गरीब न माना जाये. हमारे देश में भी गरीबी रेखा और गरीबों के श्रेणीकरण का मसला हमेशा से विवादित रहा है.

कई अर्थशास्त्री बरसों से मांग करते रहे हैं कि गरीबी रेखा की सीमा आठ से 15 डॉलर रोजाना तक तय होनी चाहिए तथा गरीबों के बच्चों के लिए इतना इंतजाम हो कि वे पांच साल की आयु से ज्यादा जीवित रह सकें. निर्धनता और विषमता के निर्धारण का आधार कुल संपत्ति या औसत आय नहीं हो सकती है.

एक अध्ययन के अनुसार, हाल के वर्षों में अर्जित संपत्ति का सिर्फ पांच फीसदी ही आर्थिक तौर पर वंचित 60 फीसदी लोगों तक पहुंच सका था. यह भी चिंताजनक है कि गरीबी कम होने का दावा करनेवाले कह रहे हैं कि विषमता से परेशान नहीं होना चाहिए.

भारत उन देशों में है जहां की आबादी बहुत धीमी गति से विकास की ओर अग्रसर है. बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा, क्षेत्रीय वंचना आदि जैसी समस्याएं इसमें बाधक हैं. ऐसे में देश और दुनिया के स्तर पर गरीब और निम्न आयवर्ग के उत्थान को ध्यान में रखते हुए नीतियां बनायी जानी चाहिए, न कि सतही विश्लेषण की आड़ में भयावह विषमता को छुपाया जाना चाहिए.

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