पिंजरे का तोता पिंजरे में रहने को बाध्य

भारतीय लोकतंत्र की सचेतक लोकतांत्रिक नियामक संस्थाओं को सत्ता के कर्णधारों द्वारा किस कदर अपने कर्तव्य से विचलित करने के प्रयास किये जाते हैं और उन्हें अपनी मुट्ठी में रख कर अपने आदेशों को मनवाने और विरोधियों के दमन के लिए उन संस्थाओं भींगी बिल्ली बना कर इस्तेमाल करते हैं, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 14, 2019 7:33 AM

भारतीय लोकतंत्र की सचेतक लोकतांत्रिक नियामक संस्थाओं को सत्ता के कर्णधारों द्वारा किस कदर अपने कर्तव्य से विचलित करने के प्रयास किये जाते हैं और उन्हें अपनी मुट्ठी में रख कर अपने आदेशों को मनवाने और विरोधियों के दमन के लिए उन संस्थाओं भींगी बिल्ली बना कर इस्तेमाल करते हैं, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है सीबीआइ के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ की गयी कार्रवाई.

77 दिनों के निर्वासन के बाद मात्र 36 घंटे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उन्हें सीबीआइ निदेशक के पद पर पुनः बहाल कर दिये जाने के पश्चात बिना उनकी बात सुने तानाशाही तरीके से उन्हें उनके पद से हटा दिया गया. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में तानाशाही रवैये का सबसे स्याह और काला पक्ष है. यह दिखाता है कि सीबीआइ जैसी संस्थाएं सत्ता के खिलाफ क्यों बहुत दूर तक नहीं जा पातीं.

निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद