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संकल्प पहले ही दिन फेल

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मोहनलाल मौर्य
व्यंग्यकार
mohanlalmourya@gmail.com
मन्नालाल ने नव वर्ष की पूर्व संध्या पर तीन संकल्प लिये. अपने आराध्य देव को साक्षी मानकर और डायरी में लिखकर संकल्पों को पुख्ता किया. पहला संकल्प सवेरे जल्दी उठने का लिया. दूसरा, शराब नहीं पीने का और तीसरा, झूठ नहीं बोलने का. थर्टी फर्स्ट को पूरी रात पार्टी की और सवेरे नींद ने धर दबोचा. दोपहर ने नींद तोड़ संकल्प याद दिलवाया. पहला संकल्प पहले ही दिन फेल हो गया.
शाम को लंगोटिया यार धन्नालाल ने आमंत्रित किया. पार्टी-शार्टी करने के लिए- नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं दी. सेम टू यू कहकर मन्नालाल ने भी शुभकामनाएं दी. अब शुभ कार्य में देरी कैसी? सो, लवली-लवली पैग बनाकर मन्नालाल को थमाते हुए धन्नालाल बोला, ‘यह लो! पहला पैग नये साल के आगमन की खुशी में.’
‘मैंने तो रात से पीना छोड़ दिया है.’ ‘अबे यार क्यों मजाक कर रहा है? मजाक छोड़ और जल्दी सी गटक जा. दूसरा पैग भी बनाना है.’ ‘सच में छोड़ दिया है.’ ‘क्यों नखरे कर रहा है यार? गिलास को तो हाथ में थाम.’ ‘बिल्कुल नहीं. मैंने संकल्प लिया है. संकल्प तोड़ नहीं सकता. संकल्प तोड़ दिया तो तुम्हारी भाभी नाराज हो जायेगी. मुझे घर से निकाल देगी.’
धन्नालाल मुस्कुराते हुए बोला, ‘संकल्प ही तो लिया है. सात फेरे थोड़ी लिये हैं. अबे यार संकल्प लेने के लिए होता है. निभाने के लिए नहीं. ऐसा कर आज पी ले, कल से मत पीना.’
मन्नालाल दुविधा में पड़ गया. सोचने लगा पी लिया, तो संकल्प टूट जायेगा और पत्नी नाराज हो जायेगी. नहीं पिया तो मित्र नाराज हो जायेगा. मित्र की बात मान लेता हूं. आज पी लेता हूं, कल से नहीं. और एक बार में ही पूरा पैग गटक गया.
धन्नालाल बोला, ‘यह हुई ना मर्दों वाली बात. यह लो दूसरा पैग दोस्ती के नाम का.’ दूसरे पैग के बाद तब तक नहीं उठे, जब तक पूरी बोतल खाली नहीं हुई. मन्नालाल जब घर लौटा, तो उसके लड़खड़ाते पैर देखकर उसकी पत्नी समझ गयी. आज तो जनाब टल्ली होकर आये हैं. घर में घुसते ही क्लास लेने लगी. ‘आपने तो संकल्प लिया था न, दारु नहीं पीने का?’ ‘हां लिया था, पर धन्नालाल माना ही नहीं. उसका मान रखने के लिए पी लिया.’
धर्मपत्नी गुस्से से लाल-पीली होती हुई बोली, ‘एक तो संकल्प तोड़ दिया और ऊपर से झूठ और बोल रहे हो. आपने तो झूठ नहीं बोलने का भी संकल्प लिया था. अब उसे भी तोड़ दिया. तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते. पहली बार संकल्प लिये थे, लेकिन सब तोड़ दिये. संकल्प तोड़ने से पहले जरा भी नहीं सोचा कि किसलिए ले रहा हूं और किसलिए तोड़ रहा हूं. संकल्पों को तोड़ना ही था तो लिया ही क्यों था?’
धर्मपत्नी के मुंह से सुनकर मन्नालाल मन ही मन में सोचने लगा. संकल्प नहीं लेता, तो ही अच्छा रहता. कम से कम धर्मपत्नी के ताने तो नहीं सुनता. डायरी के जिस पन्ने पर लिखकर संकल्प लिया था, उस पन्ने को फाड़कर फिर कभी संकल्प नहीं लेने का उसने अपने आप से वादा किया.
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