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साल बीत गया

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
साल 2018 का लेखा-जोखा इस प्रकार है. किसानों की याद आयी नेताओं को. जीतनेवालों को वादे करते वक्त आयी. हारनेवालों को हारने के बाद आयी कि हाय हम वादे पहले क्यों न कर पाये? किसान कुल मिला कर चुनावी साल में जितना खुश रह सकता था, उतना खुश रहा. बाकी के सालों में उसे दुखी रहना है, यह बात समझदार किसान हमेशा जानता है.
विदेश से मिशेल आ गये, वही हैलीकाॅप्टर डील के मिडिलमैन. हमारे अपने मैन विजय माल्या अभी न आ पाये, लंदन में मौज ले रहे हैं और उस जेल का गुणवत्ता परीक्षण कर रहे हैं, जिसमें शायद उन्हें कभी रहना भी पड़े. फिल्म इंडस्ट्री बदल गयी 2018 में. पुराने स्टारों की फिल्में नहीं चलीं. ठाकरे और मनमोहन सिंह पर बनी फिल्में चल पड़ी हैं.
ऐसी आशंकाएं रहीं कि अभिनेताओं का रोजगार भी नेताओं के कारगुजारियों पर आधारित हो जायेगा. पब्लिक रोयेगी-हंसेगी तो नेताओं की कारगुजारियों पर, फिल्में बनेंगी तो नेताओं की कारगुजारियों पर. सब नेता ही करेंगे, तो फिर बाकी लोग क्या करेंगे?
बाकी लोग टीवी सीरियल देखेंगे, जो नेताओं पर नहीं हैं, बल्कि डायन और उनकी उपलब्धियों पर हैं.अमिताभ बच्चन पूरे साल चाय से लेकर ज्वेलरी और ब्यूटी क्रीम से लेकर बाकी सब बड़ी मुस्तैदी से बेचते रहे. वहीं उनके पुत्र अभिषेक बच्चन विपक्ष के उस अभियान के ब्रांड एंबेसडर बने रहे कि देश में रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं.
आइपीएल के लिए करोड़ों के खिलाड़ी बिके. अलबत्ता प्याज सही भाव पर नहीं बिक पाये. प्याज सही भाव पर न बिके, तो कई नेता खुश रहते हैं. प्याज के सही भाव न मिलें, तो वोटों की फसल सही कटती है.
अनुपम खेर साल के अंत में एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर के ट्रेलर में बहुत बात करते दिखे. फिर ट्रेलर के आने के बाद अनुपम खेर ने इतने टीवी चैनलों को इंटरव्यू देकर इतनी बात कर डाली, जितनी मनमोहन सिंह ने पूरे दस साल के अपने पीएम काल में नहीं की थी. इतनी बात, यानी अनुपम खेर ने मनमोहन सिंह की एक्टिंग ठीक नहीं की है, ऐसा प्रतीत हुआ.
साल 2018 में अखिलेश यादव और मायावती जम कर मिले और इतना मिले कि तय कर लिया कि राहुल गांधी से मिलने की खास जरूरत नहीं है.
राहुल गांधी से मिलना जरूरी है, ऐसा कई बार शरद पवार को लगा. पवार को बहुत पहले लगा था कि वह अपने दम पर ही प्राइम मिनिस्टर बन सकते हैं, तब वह ज्यादा लोगों से नहीं मिलते थे. रोज भाजपा से जबानी जंग के बावजूद राज्य, केंद्र और स्थानीय निकाय की कुर्सियों में उनके तार भाजपा से बहुत गहरे मिले रहे. बंदा कुर्सी पर मिला रहे, यही परम सत्य है, बातों में गरमा-गरमी निरर्थक है, कुर्सी ठोस होती है, बातें ठोस कहां होती हैं.
कुल मिला कर 2018 बीत गया, कोई न चाहे, तो भी. हालांकि, कई सत्तारूढ़ नेताओं का मन था कि 2018 खत्म ही न हो और 2019 के लोकसभा चुनाव दूर ही बने रहें.
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