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जलवायु पर राजनीति

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पोलैंड में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में ठोस सहमति बनने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. तीन साल पहले हुए पेरिस समझौते को लागू करने के कार्यक्रम को इस साल के अंत तक तय कर लेना है, लेकिन सोमवार को शुरू हो रही मंत्री-स्तरीय बैठक में आम राय की संभावना बहुत कम है. अमेरिका पेरिस समझौते से पहले ही अलग हो चुका है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे निरस्त करने की मांग उठाते रहे हैं.

इस साल अक्तूबर में इस विश्व संस्था ने एक रिपोर्ट में कहा था कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान की गति को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना संभव है, लेकिन इसके लिए ऊर्जा उपभोग में बदलाव समेत अनेक कदम उठाने की जरूरत है. इसमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 2030 तक लगभग 45 प्रतिशत कटौती का सुझाव दिया गया है. तेल के चार बड़े उत्पादक देशों- सऊदी अरब, अमेरिका, रूस और कुवैत- इस रिपोर्ट को अधिक महत्व देने के पक्ष में नहीं हैं, जबकि कई देश इसके आधार पर पहल के पक्षधर हैं.

समुद्री जलस्तर बढ़ने के खतरे का सामना कर रहे द्वीपीय देशों, 47 अविकसित देशों के समूह के साथ बड़ी संख्या में यूरोपीय, अफ्रीकी, लातिनी अमेरिकी और एशियाई देशों ने संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट का स्वागत किया है. आगामी उपायों पर एकमत होने की राह में दूसरी बड़ी चुनौती विकासशील देशों को यह भरोसा दिलाना है कि धनी देश कम कार्बन उत्सर्जन पर आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर होने के लिए आवश्यक वित्तीय मदद मुहैया करायेंगे. एक तरफ भारत, चीन समेत अनेक देश हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था की बढ़त के लिए ऊर्जा की उत्तरोत्तर जरूरत है. इन देशों में शहरीकरण की गति भी तेज है. कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार विकसित देश धन उपलब्ध कराने के वादों पर ठीक से अमल नहीं कर रहे हैं.

भारत ने 2030 तक उत्सर्जन में 30 से 35 प्रतिशत कटौती करने के साथ 40 प्रतिशत विद्युत उत्पादन स्वच्छ स्रोतों से करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. फ्रांस और अन्य कई देशों के साथ भारत ने सौर ऊर्जा के विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के रूप में उल्लेखनीय पहल भी की है. यूरोपीय संघ और चीन ने भी उत्सर्जन नियंत्रण करने के लिए भारी निवेश किया है.

वैश्विक व्यापार के लिए ये बहुपक्षीय व्यवस्था पर भी निर्भर हैं. यह बहुत चिंताजनक बात है कि कुछ देश इस धरती के भविष्य को खतरे में डालकर अपने आर्थिक हितों को साधना चाहते हैं. अमेरिकी संरक्षणवाद समूह-20 के देशों से अलग है, तो सऊदी अरब और अन्य बड़े तेल उत्पादक देश अपने कारोबार को बचाना चाहते हैं.

विकासशील और अविकसित देशों के सामने अपनी आबादी की जरूरतें पूरी करने और उत्पादन को बढ़ाने की चुनौती है. बड़ी शक्तियों की आर्थिक और राजनीतिक तनातनी तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं से मिल रही प्रतिद्वंद्विता के माहौल में सहमति की उम्मीद बहुत कम है. यह धरती और मानव जीवन के लिए भयावह है.

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