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शहरीकरण में तेजी

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भारत में अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास और वाणिज्य, व्यवसाय एवं पेशे के पारंपरिक रूपों में परिवर्तन के कारण शहरीकरण की प्रक्रिया भी तेज हुई है. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के ताजा अध्ययन में बताया गया है कि 2019 और 2035 के बीच सबसे तेजी से बढ़नेवाले सभी शीर्ष 10 शहर भारत में हैं. इनकी बढ़त की गति 8.16 और 9.17 के बीच है. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, हमारे देश की जनसंख्या का 31.16 प्रतिशत हिस्सा शहरों का निवासी है.

वर्ष 2007 में आयी संयुक्त राष्ट्र विश्व जनसंख्या रिपोर्ट का आकलन है कि 2030 तक यह आंकड़ा 40.76 प्रतिशत हो जायेगा. विश्व बैंक का मानना है कि 2050 तक जो देश शहरी आबादी की बढ़त की अगुवाई करेंगे, उनमें चीन, इंडोनेशिया, नाइजीरिया और अमेरिका के साथ भारत भी शामिल होगा. शहरीकरण की इस प्रक्रिया में कई चुनौतियां और समस्याएं भी हैं. यदि आर्थिक दृष्टि से देखें, तो 2035 में सकल घरेलू उत्पादन के हिसाब से जो दस शहर शीर्ष पर होंगे, उनमें एक भी भारतीय नहीं है.

इस लिहाज से एक बड़ी चुनौती बढ़ती शहरी आबादी के लिए रोजगार उपलब्ध कराना होगा, ताकि इस बढ़त का आर्थिक लाभ देश को मिल सके. इसी के साथ आवास, भोजन, पानी, शिक्षा, प्रशासन और प्रबंधन पर समुचित ध्यान देना होगा. शहरी आबादी में बढ़ोतरी का एक कारण कृषि संकट से पैदा हुआ पलायन भी है. खेती और संबंधित पेशों से आबादी के भार को कम करना भी जरूरी है.

शहरीकरण सभी सरकारों के एजेंडे में रहा है, पर दुर्भाग्य की बात है कि इस संबंध में ठोस नीति या कार्यक्रम का अभाव अभी तक बना हुआ है. दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहर भारत में ही हैं. शहर बीमारियों के केंद्र बने हुए हैं और हर साल लाखों लोग मारे भी जाते हैं.

पेयजल की आपूर्ति कम और गुणवत्ता निम्न है तथा भूजल का दोहन निर्बाध जारी है. बारिश के पानी का संग्रहण भी संतोषजनक नहीं है. शहरीकरण और आर्थिक वृद्धि ने ऊर्जा की मांग को भी बढ़ाया है. वर्ष 2016 में वैश्विक ऊर्जा उपभोग में भारत की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत थी, जो 2040 तक 11 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.

ऊर्जा का सीधा संबंध पर्यावरण और प्रदूषण से है. वर्ष 2015 के एक अध्ययन में जानकारी दी गयी थी कि जिन भारतीय शहरों में मोटापा, घनत्व, दुर्घटनाएं जैसी समस्याएं हैं, वहां कार्बन उत्सर्जन भी अधिक है. यह संतोषजनक है कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ाने को प्राथमिकता दी जा रही है.

एक शोध के मुताबिक, 2005 और 2015 के बीच 11 राज्यों की प्राकृतिक पूंजी यानी वन, खाद्य, शुद्ध वायु आदि में बड़ी कमी आयी है. ऐसे में पर्यावरण और विकास का समुचित संतुलन पर ध्यान देने की जरूरत है. शहरीकरण का एक नकारात्मक पक्ष असंतुलन का है. यह प्रक्रिया कुछ क्षेत्रों के बजाय यदि पूरे देश में हो, तो इसका लाभ अधिक व्यापक होगा. उम्मीद है कि सरकारें इन तमाम पहलुओं के आधार पर आगे की दिशा निर्धारित करेंगी.

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