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Home Opinion और अब ऊंट की आफत!

और अब ऊंट की आफत!

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
कई राज्यों के विधानसभा चुनाव कई चरणों में निबट लिये हैं. अब ऊंट की आफत आ गयी है. ग्यारह दिसंबर को घोषित होनेवाले चुनाव परिणामों में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह सवाल तमाम चैनलों पर चल निकला है. एक तरह से तमाम चैनल दर्शकों के लिए यह अच्छी खबर है. नाग-नागिनों से हटकर मामला अब ऊंट पर आ गया है.
मैंने एक वरिष्ठ ऊंट का साक्षात्कार लिया है, पेश है-
सवाल- आपकी करवट की बहुत चिताएं हैं इन दिनों. चैनलों पर सवाल चल रहा है- ऊंट किस करवट बैठेगा.
ऊंट (बिग बास देखते हुए)- मेरी करवट की चिंता क्यों हो रही है सबको. मेरी करवट क्या किसी हसीना की अंगड़ाई है, जिस पर तमाम टीवी चैनलों में प्राइम टाइम डिबेट हो?
सवाल- यह किस तरह की बातें कर रहे हैं आप? आप तो समझदार किस्म के ऊंट थे, आप तो कतई टीवी दर्शक इंसान की तरह बातें कर रहे हैं.
ऊंट- इधर मैं टीवी चैनल बहुत देखने लगा हूं, सो मेरी सोच-समझ और भाषा पर उनका असर पड़ा हो सकता है. पर ऊंट की करवट की चिंता की क्या जरूरत है. इस नहीं तो उस करवट बैठ जायेगा, मुद्दे दूसरे हैं. उन पर बात कीजिए.
सवाल- देखिए, आप ऊंट हैं, ऊंटों से जुड़े मुद्दों पर ही आपसे बात हो सकती है.
ऊंट- मुझे क्या टीवी एंकर समझ रखा है कि मैं सिर्फ नागों, बगदादी और अपराधों पर ही बात कर सकता हूं? आप मुझसे हर विषय पर सवाल पूछ सकते हैं. मुझसे गंभीर विषयों पर विमर्श कीजिए. मैं ऊंट हूं, गधा नहीं.
सवाल- तो बतायें, ऊंट 11 दिसंबर को किस करवट बैठेगा.
ऊंट (करवट बदलते हुए)-आप बात नहीं समझ रहे हैं. ऊंटों की करवट को इतनी तवज्जो देना ठीक नहीं है. आखिर यह मुहावरा क्यों ना बना, कुत्ता किस करवट लेटेगा या गधा दायीं तरफ सिर उठाकर ढेंचू बोलेगा या बायीं तरफ?
ऊंटों की प्राइवेसी की किसी को कोई फिक्र नहीं है. समूची मानवजाति का इतिहास उठाकर देखा है मैंने- किसी और जानवर की करवट की चिंता नहीं की जाती है. ऊंटों की करवटों की गिनती इंसान कर पाता है, इसलिए कि ऊंट शरीफ है, कुछ नहीं कहता. कभी शेर की करवट का जिक्र क्यों ना होता? ऊंटों की भलमनसाहत का बहुत फायदा उठाया गया है.
यह बात सही नहीं है. ऊंटाधिकार आयोग का गठन होना चाहिए, जो यह विश्लेषित करे कि आखिर ऊंटों का शोषण कैसे और कब रुकेगा. ऊंटाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाने की बात आये, तो मुझे याद कीजिए. मुझ में अध्यक्षोचित गुण हैं, किसी भी साहित्यिक गोष्ठी के अध्यक्ष की तरह मैं घंटों बोल सकता हूं, बिना चिंता किये कि मूल मसला है क्या.
सवाल- जी आप बहुत देर से बोल रहे हैं, पर कहा आपने कुछ भी नहीं है.
ऊंट- ये तो आप टीवी एंकरों की क्वालिटी की बात कर रहे हैं. मैं तो खुद को अध्यक्ष मान रहा हूं.
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