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कश्मीर की राजनीति

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कुमार प्रशांत

गांधीवादी विचारक

k.prashantji@gmail.com

फिर वही हुअा जो नहीं होना चाहिए था; या फिर उसी तरह हुअा जिस तरह नहीं होना चाहिए था; या फिर राज्यपाल ने कश्मीर के मर्म पर उस तरह वार किया है, जिस तरह कोई बहादुर वार नहीं करता है. यह कायरता है.

कश्मीर के साथ हम ऐसी कायरता शुरू से ही करते अाये हैं. कायरता जोड़ती नहीं, तोड़ती व काटती है. हमने फिर कश्मीर को तोड़ा व काटा है. अगर यह राष्ट्रद्रोह नहीं है, तो हमें इस कृत्य का कोई दूसरा विशेषण गढ़ना पड़ेगा.

राजनीति संभावनाअों का खेल है. मुफ्ती मोहम्मद साहब ने जब भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर कश्मीर में सरकार बनायी, तब भी हमने उसे गहरी संभावनाअों वाला प्रयोग मानकर स्वीकार किया था. यह प्रयोग उस पीडीपी अौर भाजपा के बीच होने जा रहा था, जिनमें किसी भी स्तर पर समानता नहीं थी. दोनों एक-दूसरे का इस्तेमाल कर अपनी जड़ें मजबूत करने की चालाकी में साथ अाये थे.

हमने इस चालाकी से एक दूसरी संभावना बनती देखी. ये एक-दूसरे की जड़ें भले काटें, दो अतिवादी ताकतें यदि सत्ता की खातिर भी साथ अाती हैं, तो कश्मीर का सत्ता-समीकरण बदलेगा अौर सत्ता की लालसा दोनों को भी बदलेगी. ऐसा ही होता भी शायद यदि मुफ्ती साहब का इंतकाल नहीं हो गया होता. उनका इंतकाल कश्मीर में संभावित परिवर्तन का भी इंतकाल था.

उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने जब भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी, तब उस गठजोड़ में सत्ता के अलावा दूसरी कोई संभावना बची नहीं थी. हिंदुत्व के नाम पर जम्मू में जड़ जमाने के बाद, पीडीपी के मंच से कश्मीर में खड़ा होने की संभावना मोदी-शाह मार्का राजनीति को लुभा रही थी.

सत्ता के रास्ते खुद को पार्टी व राज्य में स्थापित करने का लोभ महबूबा को खींच रहा था. साफ था कि यह गठजोड़ तब तक ही चलेगा, जब तक कोई दूसरे को धोखा न दे दे या दोनों में से कोई यह न समझ ले कि इस रिश्ते में से जितना संभव था, उतना फायदा उठा लिया. भाजपा के लिए महबूबा जब सिट्ठी मात्र बचीं, तो उसने समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी. सबसे बड़ा नुकसान महबूबा का हुअा. पिता ने अपने तेवरों के कारण कश्मीर के असंतुष्टों में जो जगह बनायी थी, भाजपा के साथ जाने अौर दिल्ली से दबने के कारण महबूबा ने वह खो दिया. भाजपा को कश्मीर में कभी कुछ खोना था नहीं, उसे जितना मिला वही बोनस! लेकिन इस सरकार के गिरने से कश्मीर के लोग अाहत नहीं हुए.

लेकिन अब वे बहुत अाहत हैं. नयी सरकार की संभावना पर जिस तरह राज्यपाल ने ताला जड़ा, उससे कश्मीर का मन अौर कड़वा हुअा है.

महबूबा सरकार जाने के बाद विधानसभा भंग नहीं की गयी, ताकि कोई राजनीतिक विकल्प उभरे, तो उसे मौका दिया जाये. भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने का रास्ता पहले दिन से खोज रही थी. महबूबा-उमर अब्दुल्ला-राहुल गांधी का त्रिकोण ज्यादा समझदारी दिखाता, तो सरकार जाने के दूसरे दिन ही महबूबा नयी सरकार का दावा पेश कर सकती थीं.

भाजपा को पता था कि वह जैसा खेल खेलने की कोशिश में हैं, उसमें राज्यपाल वोहरा अड़चन पैदा करेंगे. अत: महबूबा की मिट्टी पलीद करने के तुरंत बाद राज्यपाल वोहरा की विदाई हुई अौर राजनीतिक जोड़तोड़ के एक पिटे हुए खिलाड़ी को राज्यपाल की पोशाक पहना दी गयी. अब उससे वह काम करवाया गया है, जिससे हर कश्मीरी के मन में बैठी वहीं गांठ अौर कड़वाहट के साथ मजबूत हुई है जो कहती, मानती अौर सप्रमाण बताती है कि दिल्ली कभी हमारा कोई फैसला कबूल ही नहीं करती है.

राज्यपाल सत्यपाल मलिक सत्य को ढांकने की जितनी कोशिश कर रहे हैं, उतने ही बेपर्दा होते जा रहे हैं. उन्हें पता था कि महबूबा-उमर-राहुल का समीकरण बन रहा है अौर इस समीकरण के पास अासानी से 56 विधायकों का बहुमत बन रहा है.

राज्यपाल को यह भी पता था कि भारतीय जनता पार्टी सज्जाद गनी लोन को अागे कर दूसरा समीकरण भी बना रही है. सज्जाद गनी लोन के पास दो विधायक भर हैं. भाजपा के विधायकों को मिलाने से भी बात नहीं बनती, इसलिए लोन ने बताया कि उन्हें दूसरी पार्टियों के 18 अन्य विधायकों का समर्थन प्राप्त है.

इससे अधिक अादर्श स्थिति अौर क्या होती कि वे महबूबा-गठबंधन को सरकार बनाने का मौका देते अौर उनकी विफलता के बाद गनी लोन साहब को भी मौका देते. राज्यपाल संवैधानिक नैतिकता का तकाजा पूरा करने के बाद, विधानसभा भंग करने की घोषणा करते, तो किसी को भी नहीं अखरता.

राज्यपाल ने दूसरा तीर चलाया कि विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही थी. अब उमर अौर महबूबा दोनों पूछ रहे हैं कि राज्यपाल प्रमाण के साथ बतायें कि किसने, किसके विधायक तोड़ने-खरीदने की कोशिश की? जिनके पास अपने ही विधायक सरकार बनाने के लिए पर्याप्त हैं, वे खरीद-फरोख्त क्यों करेंगे? जो जूता काट रहा था, वह भाजपा के पांवों में तो नहीं अाता है? राज्यपाल तत्क्षण मौन हो गये.

लेकिन न कश्मीर मौन हुअा है, न देश अौर न संविधान के रखवाले! इसलिए राज्यपाल की यह अलोकतांत्रिक मनमानी का सवाल लेकर महबूबा को सर्वोच्च न्यायालय में जाना चाहिए, ताकि राज्यपाल व केंद्र दोनों अपनी मर्यादाएं समझें.

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