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नौकरशाही बेहतर बने

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कभी सरदार पटेल ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइएएस) को स्टील फ्रेम यानी इस्पात का ढांचा की संज्ञा दी थी, जिस पर देश का सरकारी तंत्र टिका हुआ है. लेकिन आज कई लोग इस सेवा को इस्पात के पिंजरे के रूप में देखते हैं, जो शासन की गति को अवरुद्ध कर रहा है.
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक व्याख्यान में कहा है कि नौकरशाही देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है और इसमें सुधार की दरकार है. हालांकि उन्होंने नौकरशाही के अहम योगदान को भी रेखांकित किया है, लेकिन देश-दुनिया में बदलाव के साथ लोक सेवा में सुधार पर जोर दिया है.
पूर्व राष्ट्रपति के अनुसार, नौकरशाही आगे की राह हमवार करने की जगह रुकावट खड़ी करने और बहाने बनाने के मौके तलाशती है. उन्होंने यह भी कहा कि अफसरशाही खुद के बनाये अलग-थलग माहौल में सोचती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पहले कह चुके हैं कि अफसरशाही 19वीं सदी की संरचना है, जो 21वीं सदी की समस्याओं से जूझ रही है. कई जानकार भी अरसे से इन खामियों को इंगित करते रहे हैं. इन खामियों से भ्रष्टाचार, फैसले लेने में आलस या देरी और लापरवाही जैसी दिक्कतें पैदा होती हैं. लेकिन इनका हल आसान नहीं है. हमारे शासन तंत्र के महत्वपूर्ण पद आइएएस और उसकी सहयोगी सेवाओं के हिस्से आता है.
इस कारण इन सेवाओं से बाहर की लोकसेवाओं के कर्मियों के लिए आगे बढ़ने के अवसर बहुत सीमित हो जाते हैं. आठ साल पहले केंद्र सरकार के अधिकारियों के एक सर्वेक्षण में एक-तिहाई अफसरों का मानना था कि शासन प्रणाली न्यायपूर्ण या पारदर्शी नहीं है तथा आधे अफसरों ने कहा था कि उन्हें भारी बाहरी दबाव में काम करना पड़ता है.
साल 2012 में हांगकांग की एक भरोसेमंद संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि भारतीय नौकरशाही एशिया में सबसे खराब है और अधिकारियों को आम तौर पर जवाबदेह नहीं ठहराया जाता है. इसका एक नतीजा सरकार पर कंपनियों के घटते भरोसे के रूप में सामने आता है.
प्रमुख नौकरशाहों और सरकार के बीच इन समस्याओं को लेकर 2013 में एक बैठक भी हुई थी तथा इस क्षेत्र में अपने और अन्य देशों के अनुभवों के आधार पर आंतरिक आकलन और वेतन बढ़ाने से संबंधित नियमों में बदलाव जैसे कुछ उपाय भी किये गये थे. इस साल लोक सेवा में सेवा और काडर के आवंटन से संबंधित नये नियम लागू हुए हैं. केंद्र सरकार में विभिन्न पदोंपर कुछ पेशेवर लोगों को नियुक्त करने का भी प्रयास हुआ है, परंतु सेवा के नियमों और केंद्रीकृत संस्कृति में बड़े फेर-बदल की जरूरत है.
इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की दरकार तो है ही, ताकतवर नौकरशाह लॉबी से भी जूझना होगा क्योंकि वह आसानी ने अपने वर्चस्व और विशेषाधिकार को नहीं खोना चाहेगी. बहरहाल, यह संतोष की बात है कि पूर्व राष्ट्रपति के बयान से अफसरशाही को बेहतर बनाने की बहस फिर से चर्चा में है.
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