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सुधारों का फायदा

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अर्थव्यवस्था की बढ़त और उसके स्थायित्व के लिए यह आवश्यक है कि कारोबारी गतिविधियां सुगमता से जारी रहें. इस प्रक्रिया में समय-समय पर नियमों और नीतियों में अपेक्षित सुधार भी जरूरी होते हैं.
मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में अनेक ऐसे बड़े निर्णयों को अंगीकार किया है, जिनसे अर्थव्यवस्था को तात्कालिक झटका तो लगा, पर अब उनके लाभ दिखने लगे हैं. नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर प्रणाली (जीएसटी), गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का निवारण, बैंकिंग सुधार, दिवालिया कानून आदि पहलों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है.
व्यापारिक सुगमता के लिहाज से वैश्विक समुदाय में भारत की लंबी छलांग इस बात का ठोस प्रमाण है कि आर्थिक सुधारों के कारण कारोबार लगाने और बढ़ाने का समुचित माहौल बन रहा है. इस श्रेणी में विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में 23 पायदान ऊपर चढ़ते हुए अब भारत 77वें स्थान पर पहुंच गया है. पिछली सूची में 190 देशों में 30 पायदान चढ़ते हुए भारत 100वें स्थान पर पहुंचा था, जो कि पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी छलांग थी.
साल 2003 से जारी हो रही विश्व बैंक की यह सूची किसी भी देश के कारोबारी माहौल का अंदाजा लगाने का एक भरोसेमंद जरिया है तथा इसे व्यावसायिक क्षेत्र में किये गये सर्वेक्षण से ही निर्धारित किया जाता है. आंतरिक और विदेशी निवेशक पूंजी लगाने का निर्णय लेते हुए ऐसी रिपोर्टों का संज्ञान लेते हैं. इस उपलब्धि के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर आर्थिक सुधारों को जारी रखने की अपनी सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया है, ताकि उद्योग, निवेश और अवसरों को बढ़ाने का सिलसिला बना रहे. अक्तूबर में जीएसटी की वसूली का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये पार करने की खबर भी उत्साहवर्धक है.
इस वित्त वर्ष में पहली बार यह सीमा पार की गयी है. इससे इंगित होता है कि इस कर प्रणाली में हुए बदलाव सही दिशा में हैं. चूंकि व्यापार की सुगमता निर्धारित करने में नियमों एवं नीतियों में सरलता और पारदर्शिता के साथ कराधान की बेहतर व्यवस्था को भी गिना जाता है, ऐसे में जीएसटी की मजबूती सकारात्मक कारक है.
सरकारी तंत्र में मौजूद लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण नयी परियोजनाओं या नये व्यवसाय के लिए पहले काफी मुश्किलें आती थीं. जगह या पूंजी के बारे में मंजूरी के लिए कई विभागों और अधिकारियों के दरवाजों पर दस्तक देनी पड़ती थी. आर्थिक उदारीकरण के साथ इन समस्याओं में सुधार तो आया था, पर वह पर्याप्त नहीं था.
नयी नीतियां बनाने और पुरानी नीतियों में संशोधन की धीमी प्रक्रिया भी आर्थिक विकास के लिए बाधक बनी हुई थीं. साल 2014 के बाद आयी सुधारों की तेजी ने कारोबारियों को आकर्षित किया है. इसी का नतीजा है कि विकास दर में बढ़त है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की हलचलों को हमारी अर्थव्यवस्था काफी हद तक बर्दाश्त कर सकने की हालत में है.
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