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Home Opinion हमारी परंपरा में मिट्टी के दीये

हमारी परंपरा में मिट्टी के दीये

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कविता विकास
लेखिका
kavitavikas28@gmail.com
शहर की पुरानी संकरी गलियों में दीवाली के बाजार सज गये हैं. कमाल की रौनक है. सड़क के दोनों ओर चाइनीज लाइटों की चमचम, कागजी घरौंदों में रंगीन दीये और लैंपों की जगमगाती रोशनी में नहाती रात, मानो फंतासी दुनिया का साकार होता सपना हो, जो पारियों की कहानी में हुआ करता था. खील-बताशों और अन्य मिठाइयों से आती खुशबू मानो गली में हवा के कंधों पर बैठकर सैर कर रही है.
उमड़ती भीड़ ऐसी कि एक जगह खड़े हो जाओ, तो धक्के खा-खाकर गंतव्य तक पहुंच जाओ. बच्चे हाथों में बैलून लिये पटाखे की खरीदारी में व्यस्त. करीब हर छोटे शहर में दिल्ली के चांदनी चौक जैसी ये गलियां उस शहर का गौरव होती हैं, जिनसे ऐतिहासिक महत्व के किस्से-कहानियां जुड़ी होती हैं.
दुकानों के सामने जमीन पर मिट्टी के दीये, घड़े-सुराही, कलश और खिलौनों का अंबार लगा हुआ है. वंदनवार, झालर और सजावट के लिए रंग-बिरंगे कागजों की उत्कृष्ट कलाकृतियां हैं.
बहुत आकर्षक होती हैं गलियों में सजनेवाली ये दुकानें. मॉल को छोड़कर हुजूम यहां इसलिए भी टूट पड़ता है, क्योंकि उन्हें यहां चीजें सस्ती मिलती हैं. एक ऐसी ही गली से गुजरते हुए मैंने दीये बेचनेवाले एक बुजुर्ग से पूछा कि क्या इन आकर्षक बत्तियों के बीच दीये की बिक्री होती है? बुजुर्ग ने अपने ज्ञान को अनुभव की चाशनी में डालते हुए उत्तर दिया कि ये चाइनीज लाइट तो केवल मकान के बाहरी भाग की सजावट में लटका दिये जाते हैं, पर घर की असली शोभा तो उसके अंतर में बसा पूजा का वह स्थल है, जहां अब भी दीये ही जलाये जाते हैं. भले ही कांसा-पीतल और चांदी के दीये भी हों, पर कुछ न कुछ मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा तो रहेगी ही.
मिट्टी से हमारा दैहिक संबंध है. इसकी महक और इसकी पवित्रता अक्षुण्ण है. मिट्टी सादगी और क्षणभंगुरता का भी शुद्ध रूप है. मिट्टी का एक दीया अपने अकेले होने पर भी गर्व करता है.
कार्तिक महीने में अनेक घरों में चौबारे की तुलसी के आगे मिट्टी का एक दीया अकेला जलता हुआ अंधियारे में गर्व से प्रकाश फैलाता मिल जायेगा. दूसरी ओर, दीयों में एक पंक्ति से भी जुड़ने की चाह होती है, इसलिए झोपड़ी या हवेलियों की सजावट में वे एक सूत्र में बंधकर तारों का प्रतीक बन अमावस्या की रात को चांदनी रात में तब्दील कर देते हैं. मिट्टी के दीये जिंदगी की क्षणभंगुरता का भी पर्याय हैं. मिट्टी का मिट्टी से मिल जाना आदि से अंत तक की कहानी है. इसलिए जब तक जीवित हैं, रोशनी बिखेरते रहना है.
ओशो के अनुसार, मिट्टी मनुष्य की देह है और ज्योति उसकी आत्मा. किंतु जो इस सतत ऊर्ध्वगामी ज्योतिशिखर को विस्मृत कर दे, वह बस मिट्टी ही रह जाता है.
पर्व का अर्थ बहुत गूढ़ है. घर, समाज और देश का धन-धान्य से परिपूर्ण होना उत्सव की उत्पत्ति करता है. संस्कृति रहेगी, तो मानव-मूल्यों का संवर्धन होगा. पर्वों का मर्म खुशियां बांटना है, तो इस बार मिट्टी के दीये खूब खरीदें, ताकि उन्हें रचनेवाले सुगढ़ हाथों को उनका मूल्य मिल पाये और वे भी खुशियां मना सकें
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