रिजर्व बैंक और सरकार

कुछ नीतिगत मुद्दों पर देश के केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच असहमति का आपसी विचार-विमर्श से न सुलझ पाना अफसोसनाक है. जिस मामले को वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक के गलियारों तक सीमित रहना था, उसकी चर्चा सार्वजनिक हो रही है. रिजर्व बैंक के उप-प्रमुख विरल आचार्य ने संकेत दिया था कि सरकार संस्थान […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | October 31, 2018 6:40 AM
कुछ नीतिगत मुद्दों पर देश के केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच असहमति का आपसी विचार-विमर्श से न सुलझ पाना अफसोसनाक है. जिस मामले को वित्त मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक के गलियारों तक सीमित रहना था, उसकी चर्चा सार्वजनिक हो रही है. रिजर्व बैंक के उप-प्रमुख विरल आचार्य ने संकेत दिया था कि सरकार संस्थान की स्वायत्तता का सम्मान नहीं कर रही है. उन्होंने आगाह किया था कि सरकार का यह रवैया भविष्य में वित्तीय बाजार की स्थिरता और तेज आर्थिक वृद्धि के लिए बाधक हो सकती है.
वित्तीय नियमन और निगरानी के मामले में रिजर्व बैंक सर्वोच्च संस्था है. रुपये की घटती कीमत, बैंकों पर बढ़ता गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का दबाव और मुद्रास्फीति को अंकुश में रखने जैसे मुद्दों पर रिजर्व बैंक निश्चित ही अपने अधिकार-क्षेत्र के भीतर कुछ नीतिगत समाधान सोच सकता है.
इसी तरह से ब्याज दरों, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की न्यूनतम सुरक्षित संपदा-कोष और डिजिटल भुगतान के नियमन के मसलों पर रिजर्व बैंक की एक निश्चित सोच-समझ का होना स्वाभाविक है. दूसरी तरफ देश की आर्थिक हालत की बेहतरी के उपायों की जिम्मेदारी और जवाबदेही सरकार की भी है तथा वह अपने स्तर पर नीतिगत पहलों पर विचार कर सकती है.
जरूरी नहीं है कि ये पहलें रिजर्व बैंक की दृष्टि और सोच से मेल खाएं. सरकार का मानना है कि ब्याज की दर नीचे रहे, तो बाजार में निवेशकों के लिए कर्ज लेना आसान होगा और सरकारी बैंकों पर रिजर्व बैंक अगर सुरक्षित संपदा-राशि ज्यादा रखने का दबाव न बनाये, तो बैंकों के लिए कर्ज देना आसान हो जायेगा. रिजर्व बैंक ने एक तो सरकार की अपेक्षा के अनुरूप ब्याज दरों में कमी नहीं की.
दूसरे, सरकारी क्षेत्र के 11 बैंक फिलहाल बड़े व्यावसायिक कर्ज नहीं दे पा रहे हैं. इन बैंकों का एनपीए ज्यादा है. रिजर्व बैंक ने इन्हें कहा है कि आधारभूत राशि-कोष एक निश्चित सीमा तक पहुंच जाने के बाद ही ये बैंक कर्जे देने के बारे में सोच सकते हैं. डिजिटल भुगतान और निबटान को लेकर भी सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद है.
सरकार डिजिटल भुगतान के नियमन-नियंत्रण का जिम्मा एक अलग नियामक के जिम्मे सौंपना चाहती है, जबकि रिजर्व बैंक की राय है कि नकदी के लेन-देन की तरह डिजिटल लेन-देन की देख-रेख भी वही करे. रिजर्व बैंक मौद्रिक वस्तुस्थिति का आकलन कर वित्त बाजार की स्थिरता की दृष्टि से सोच रहा है. लेकिन, सरकार बाजार को गतिशील बनाये रखने के लिए जोखिम उठाने के नजरिये से देख रही है. देश के वित्त बाजार के हित में इन दोनों समझदारियों में तालमेल और संतुलन की दरकार है.
इस दिशा में जल्दी ही किसी ठोस फैसले पर पहुंचना जरूरी है, ताकि पूंजी बाजार पर निवेशकों का भरोसा कायम रहे, बैंकों का जोखिम कम हो तथा शीर्षस्थ आर्थिक नेतृत्व की आंतरिक असहमति के समाचारों से देश की छवि का नुकसान न हो.