नाम की राजनीति

एक कहावत है कि नाम में क्या रखा है, लेकिन राजनीति में स्थानों के नाम के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. ये नाम आज की राजनीति की दशा एवं दिशा तय करते हैं. नाम बदलने एवं किसी एक खास समूह को अपनी ओर आकर्षित करने की यह परंपरा नयी नहीं है, लेकिन हाल में […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | October 31, 2018 6:38 AM
एक कहावत है कि नाम में क्या रखा है, लेकिन राजनीति में स्थानों के नाम के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. ये नाम आज की राजनीति की दशा एवं दिशा तय करते हैं.
नाम बदलने एवं किसी एक खास समूह को अपनी ओर आकर्षित करने की यह परंपरा नयी नहीं है, लेकिन हाल में जो नाम परिवर्तन हुए हैं, उसने इसे नया आयाम दिया है.
उत्तर प्रदेश की कैबिनेट का निर्णय कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज होगा, अधिक चर्चा में रहा. क्या नाम बदलने से क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं का समाधान हो जायेगा? जो लोग वर्षों से इस नाम का प्रयोग करते आ रहे थे, क्या वे नये नाम से खुद को सहज महसूस कर पायेंगे? सवाल तो कई हैं, लेकिन जवाब भविष्य के गर्भ में है.
मोहम्मद इरफान, वासेपूर, धनबाद