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वैश्विक आर्थिकी के रुझान

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अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध, तेल की कीमतों में अस्थिरता, विभिन्न मुद्राओं में कमजोरी, आयात-निर्यात में उथल-पुथल के दुष्प्रभाव को देखते हुए वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक शंकाएं जाहिर की जा रही हैं.
लेकिन, विभिन्न वित्तीय संस्थाओं का आकलन है कि आर्थिक वृद्धि की गति में कमी के बावजूद विकास की ठोस संभावनाएं भी हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि 2018-2020 की अवधि में वैश्विक सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की सालाना दर 3.7 फीसदी हो सकती है, पर 2021-2023 के बीच इसमें 0.1 फीसदी गिरावट संभावित है.
इन आंकड़ों से 2022 के आसपास दुनिया की अर्थव्यवस्था 100 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच जायेगी, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 13 से बढ़कर 16 फीसदी हो जायेगी. पिछले माह आयी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2030 तक चीन और अमेरिका के बाद भारत 5.9 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जायेगा.
भारत के अलावा ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों को भी वैश्विक बढ़त का फायदा मिलेगा तथा जापान, जर्मनी, इटली और कनाडा जैसी विकसित अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा योगदान की हालत में नहीं हैं. दरअसल, उभरती अर्थव्यवस्थाओं को सस्ते श्रम, संसाधनों की उपलब्धता और बढ़ती मांग का लाभ मिल रहा है, जबकि अनेक विकसित देश ठहराव से जूझ रहे हैं. बीते सालों में भारत की ठोस नीतिगत पहलों ने आर्थिक विकास की राह को बेहतर बनाया है. कुछ निर्णय थोड़े समय के लिए नुकसानदेह साबित हुए हैं, परंतु उनके दीर्घकालिक लाभ सामने आने लगे हैं.
ऐसे आकलन उत्साहवर्धक हैं और इनसे आर्थिकी को आगे ले जाने में मदद भी मिलेगी, पर रिपोर्टों में जिन सावधानियों और चुनौतियों का उल्लेख हुआ है, उन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है. उभरती अर्थव्यवस्थाओं की नीतिगत विश्वसनीयता और अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक पहलुओं की मजबूती भविष्य-निर्धारण में महत्वपूर्ण कारक हैं.
इन कारकों की कमजोरी निवेशित पूंजी के पलायन और बाजार की अस्थिरता का कारण बन सकती है. पिछले दिनों डॉलर के दाम बढ़ने, तेल महंगा होने तथा निर्यात घटने से बड़ी मात्रा में पूंजी की निकासी हुई है तथा शेयर बाजार में गिरावट का दौर रहा है. चालू खाते का बढ़ता घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी भी चिंताजनक हैं. महंगाई घरेलू मांग पर नकारात्मक असर डाल सकती है. रोजगार के अवसर पैदा करना तथा आमदनी के व्यापक वितरण को सुनिश्चित करने की भी चुनौती है.
इन दोनों बातों का सीधा संबंध लोगों की क्रय शक्ति से है और अगर लोगों के पास बचत होती है, तो इससे उत्पादन और मांग को बढ़ाने में मदद मिलती है. अरबों-खरबों की लागत की लंबित परियोजनाएं भी चिंता का एक कारण हैं. उम्मीद है कि सरकारें, संबंधित संस्थाएं और उद्योग जगत अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाये रखने की कोशिशें जारी रखेंगे.
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