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ईमानदारी की समस्याएं

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आलोक पुराणिक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

puranika@gmail.com

मुल्क में ईमानदारों के लिए विकट समस्याएं हैं. एसीपी प्रद्युम्न केसों को बहुत मेहनत और ईमानदारी से सुलझाते थे, सीआईडी सीरियल में. एसीपी साहब निपट लिये, क्योंकि सीरियल ही निपट लिया, ऐसी खबरें हैं. विपक्ष आरोप लगा सकता है कि मोदी के राज में ना सीबीआई चीफ ढंग से काम कर सकते, ना एसीपी प्रद्युम्न ठीक से काम कर सकते. ईमानदारों के लिए बहुत आफतें हैं, एसीपी प्रद्युम्न का हाल देखकर ऐसा लगता है. बीस साल से उनका कोई प्रमोशन ना हुआ. एक जानकार ने कहा कि अंदरखाने लेते होंगे रिश्वत एसीपी प्रद्युम्न, वरना बीस साल ऐसे सेफ ना चल पाते.

बरसों पहले सीआईडी में भरती होने को इच्छुक एक नौजवान को मैं देखता था- वह सुबह से शाम तक दरवाजा तोड़ने की प्रेक्टिस करता था. कोई लिखाई-पढ़ाई नहीं करता था वह.

एक दिन उसने बताया कि वह सीआईडी में अफसर की पोस्ट पर काम करने का आकांक्षी है और अफसर होने की अर्हता यह है कि बंदा दरवाजा तोड़ने में सक्षम हो. उस नौजवान की ऐसी धारणा एसीपी प्रद्युम्न के डायलॉग को सुनकर बनी थी- दया दरवाजा तोड़ दो. दया और दरवाजे का ऐसा कांबिनेशन बना कि बाद में देखा गया कि जहां दरवाजा ना हो, वहां वारदात की छानबीन में दया को लगाया ही नहीं जाता था.

बहुत कन्फ्यूजन फैलाये सीआईडी और एसीपी प्रद्युम्न ने. एसीपी प्रद्युम्न के कड़क सीआईडी अफसर का रोल करनेवाले शिवाजी साटम संजय दत्त की फिल्म वास्तव में संजय दत्त के बेहद लाचार बाप से दिखायी दिये.

संजय दत्त इस फिल्म में अपराधी बने थे, उन्हे शिवाजी साटम रोक ना पाये. अपराधी पर नियंत्रण फिल्म में न कर पाये वह, जबकि सीआईडी में तो एसीपी प्रद्युम्न हर अपराधी को ठोंकते-पीटते रहे. फिल्में सच्चाई के करीब होती हैं और सीरियल हवा-हवाई बातें करते हैं, यह ज्ञान फिर रेखांकित हुआ फिल्म ‘वास्तव’ और ‘सीआईडी’ सीरियल के फर्क को देखकर.

मैं तीन बालिकाओं को जानता हूं, जो फाॅरेंसिक साइंस यानी अपराध विज्ञान का कोर्स करने को उन्मुख हुईं, क्योंकि उन्होंने सीआईडी में एक स्मार्ट फाॅरेंसिक साइंस एक्सपर्ट को बहुत कुशलतापूर्वक अपराध सुलझाते हुए देखा था. एक बालिका ने तो मुझसे यह पूछ लिया कि उस इंस्टीट्यूट का पता बताइये, जिससे सीआईडीवाली एक्सपर्ट ने कोर्स किया है.

मैं उस इंस्टीट्यूट का पता तलाश ना पाया और इस धारणा को पुष्ट किया कि लेखक टाइप के लोगों को कुछ ना पता होता.एक चैनल के संचालक से मैंने पूछा- सीआईडी सीरियल बंद क्यों हो रहा है? उसने पलट सवाल किया- सीआईडी कोई नागिन है क्या, जिसका किस्सा कभी खत्म ही ना हो?

नागिन के अलग जलवे हैं. जाने कितनी फिल्में नागिन की, जाने कितने सीरियल नागिन के, सीआईडी की क्या औकात नागिन के आगे? पब्लिक का जो भरोसा नागिनों में है, पब्लिक का जो सम्मान नागिनों के प्रति है, वैसा सम्मान सीआईडीवाले कभी अर्जित भी कर पायेंगे, इसमें गहरा संदेह है.

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