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विषमता की बढ़ती खाई

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राष्ट्रीय जीवन में आर्थिक विषमता एक ऐसा भयावह सच है, जो अब हमें बहुत परेशान भी नहीं करता है. राजनीति और समाज में भले ही गाहे-ब-गाहे इसे दूर करने के प्रयासों की चर्चा हो जाती है, पर वास्तविकता यही है कि इस समस्या को लोकतांत्रिक भारत का एक स्थायी लक्षण मान लिया गया है.

वित्तीय सेवा क्षेत्र में प्रख्यात और दस बड़े बहुराष्ट्रीय बैंकों में शामिल क्रेडिट स्विस ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि देश के एक प्रतिशत सर्वाधिक धनी आबादी के पास धन-संपदा का 51.1 प्रतिशत है, जबकि निचली 60 प्रतिशत जनसंख्या की कुल हिस्सेदारी मात्र 4.7 प्रतिशत ही है. हमारी राष्ट्रीय संपत्ति का 77.4 प्रतिशत भाग सबसे अधिक धनी 10 प्रतिशत जनसंख्या के हाथ में है. असमानता का यह विस्तार पिछले कुछ समय से लगातार जारी है.

संस्था की 2016 की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत की सर्वाधिक धनी एक प्रतिशत आबादी का कुल संपदा के 58.4 प्रतिशत पर मालिकाना है. साल 2015 में यह आंकड़ा 53 और 2014 में 49 प्रतिशत था. इस वर्ष फरवरी में जारी ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के मुताबिक, कुल संपत्ति में शीर्ष भारतीय धनकुबेरों का हिस्सा 54 प्रतिशत और आर्थिक विषमता के लिहाज से भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है.

जापान और अमेरिका जैसे विकसित लोकतांत्रिक देशों में भी ऐसी असमानता नहीं है. लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ संपदा के न्यायपूर्ण वितरण की भी व्यवस्था होती है, ताकि कोई अपनी आर्थिक शक्ति के बल पर दूसरे के हितों और अधिकारों का हनन न कर सके. सवाल है कि ऐसी विषमता के कारण क्या हैं. क्या आर्थिक नीतियां देश के धनी वर्ग की पक्षधर हैं और हमारा शासन आबादी के बड़े हिस्से के लिए आर्थिक सक्षमता सुनिश्चित करने में लापरवाह है?

नव-उदारवादी दौर में असमानता निरंतर बढ़ी है, पर हमारी राजनीतिक चिंता में यह प्रमुख एजेंडा क्यों नहीं बन पा रहा है? इन सवालों का सीधा संबंध हमारे लोकतंत्र की सफलता से है. कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी व्यापक विषमता को देर तक नहीं ढो सकती है.

आर्थिक समानता के साथ ही राजनीतिक और सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है. न्यायिक सिद्धांतों के प्रसिद्ध व्याख्याकार जॉन रॉल्स के दृष्टिकोण से या तो हम यह कह सकते हैं कि आर्थिक विषमता तभी सही है, जब वह सर्वाधिक गरीब की आय को बढ़ाने का माध्यम हो, या फिर मुक्त बाजारवादी व्यवस्था के पैरोकार फ्रेडरिक हायेक की तरह यह तर्क दे सकते हैं कि बाजार में सबका प्रवेश सुगम बनाने के हद तक ही असमानता को उचित ठहराया जा सकता है.

फिलहाल हमारे देश में इन दोनों में से कोई भी स्थिति साकार होती नहीं दिख रही है. आज वंचित तबकों के उत्थान के लिए निर्धारित नीतियों-कार्यक्रमों की ठोस समीक्षा जरूरी है. उदार और गतिमान अर्थव्यवस्था को स्थायी बनाने के साथ लोकतंत्र को बेहतर बनाने के लिए आर्थिक विषमता पर गंभीरता से विचार करना समय की मांग है.

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