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डिस्काउंट पर जिंदगी

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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
puranika@gmail.com
इन दिनों इश्तिहारों में डिस्काउंट बरस रहे हैं. आॅफर तैर रहे हैं हवाओं में. कल मैं गया रामलीला देखने. वहां एक पाचक चूरन का इश्तिहार था करीब पचास फुट का, उसके एक कोने में रामलीला के पात्रों के फोटू थे, लिखा था- फलां पाचक चूर्ण द्वारा स्थापित रामलीला.
इतनी तरह के स्पांसर घुस गये हैं रामलीलाओं में कि वह कहीं चूरन-लीला लगती है, कहीं साबुन-लीला, कहीं पर वह फलां ब्रांड के लड्डू की लीला लगती है. लीलाएं वाशिंग पाउडरों और चूरनों की ही हैं, पर पात्र रामलीला वाले आ गये हैं.
मुझे डर लगने लगा है. रामलीला रोक कर बीच में कहीं स्पांसर अपने खेल न दिखाने लगें. मान लीजिए, सीता को बचाने की कोशिश में जटायु संघर्षरत है. तभी सीन रोक करके एंकर पूछ रहा है- हे जटायु, इतने संघर्ष की ताकत कहां से आयी? हमारे दर्शकों को बताओ.
जटायु रामलीला के स्पांसरों के नाम पढ़ रहा है- फलां आटा खाकर, फलां शहद खाकर, फलां नमक खाकर, फलां मसाले खाकर मैं इस काबिल हो गया कि मैं संघर्ष कर सकूं.
सूपर्णखा की नाक कटी हुई है. एंकर पूछ रहा है- हे सूपर्णखा, तेरी यह दशा कैसे हुई?
सूपर्णखा जवाब दे रही हैं- क्योंकि मैंने अपना मेकअप उस ब्रांड के मेकअप स्टूडियो से नहीं करवाया था. अगर वहां से मेकअप कराया होता, तो मैं बहुत ही सुंदर लगती. नाक कटने से बचाएं और मेकअप उस मेकअप स्टूडियो से कराएं.
अब सम्मान जटायु का किया जाये या उस आटे का, जिसे खाकर उसमें संघर्ष की क्षमता आ गयी. पेचीदा सवाल है. सम्मान उस ब्रांड का ही होना चाहिए, जो किसी खिलाड़ी को, किसी एक्टर को कामयाबी पर पहुंचाता है.
रामलीलाएं स्पांसरों की चपेट में हैं. पहले रामलीला बड़ी होती थी, उसके पोस्टर-बैनर के कहीं कोने में स्पांसर का नाम होता था कि उनके सान्निध्य में रामलीला आयोजित हो रही है. अब मामला उल्टा है, स्पांसर सबसे ऊपर, सारी जगह घेरे हुए हैं.
स्पांसर जगह घेरे हुए हैं. डिस्काउंट बरस रही है. जिंदगी क्या है- जिंदगी डिस्काउंट है. जिंदगी की परम उपलब्धि क्या है- परम उपलब्धि कैशबैक है यानी कितने रुपये की खरीद पर कितना कैशबैक पाया है. डिस्काउंट, कैशबैक, आॅफर- इन दिनों यही मूल मंत्र हैं. इन दिनों लगभग हर जगह डिस्काउंट के इतने आॅफर दिख रहे हैं कि लग रहा है कि नवरात्रि का मूल उद्देश्य यही है कि तमाम कार, मकान, मोबाइल बेच लिये जायें.
बहुत खतरनाक सीन है. मार्केटिंग एक्सपर्ट जुट जायें, तो यह तक स्थापित कर सकते हैं कि पहली नवरात्रि पर मोबाइल खरीदने पर इतने पॉइंट पुण्य मिलता है. अष्टमी पर बाइक नहीं खरीदी, तो पुण्य के पुराने खाते खल्लास हो सकते हैं.
नवमी पर अगर खाना बाहर नहीं खाया, तो अन्नपूर्णा देवी नाराज हो सकती हैं. नयी कथाएं भी मार्केट में आ सकती हैं- नवरात्रि पूजा-अर्चना का नहीं, खरीदारी का वक्त है. मार्केटिंग वालों के लिए यह सब स्थापित करना कोई मुश्किल काम नहीं है.
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