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प्राकृतिक रंगों में आनंद

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कविता विकास

लेखिका

kavitavikas28@gmail.com

रंगों में अप्रतिम सौंदर्य होता है. ऐसा सौंदर्य जिसे तमाम उम्र देखते रहो, फिर भी कभी मन नहीं भरता. कायनात में प्रकृति ही एक ऐसी शय है, जो तमाम रंगों को अपने दामन में सहेजकर पूरी शालीनता के साथ रखती है और बीच-बीच में इनकी मनोहारी छटा से नयनाभिराम दृश्य उत्पन्न कराती रहती है.

ढेर सारे रंगों की बात छोड़िए, किसी एक ही रंग के इतने सारे शेड्स मिल जायेंगे कि दुनिया बनानेवाले उस चित्रकार की कलात्मकता पर आश्चर्य होता है. उदाहरण के तौर पर अपने आसपास के गाछ-वृक्षों को ही देख लें. वर्षा हरियाली का उपहार देकर जा रही है, कहीं गहरा हरा, कहीं हल्का, कहीं धानी तो कहीं कुछ और. वसंत तक हरियाली की चादर बिछी रहेगी. देना तो कोई प्रकृति से सीखे!

कहा भी गया है- जो क्षण-क्षण रूप बदले, वही सौंदर्य रमणीय है. परिवर्तन जिजीविषा को प्रबल करती है, न तो मन थकता है और न आंखें थकती हैं.

खेतों के सुदूर मुहाने पर अब कांस खिलने लगे हैं, सफेद कांस. अहाते के बाहर हरसिंगार के सफेद फूल शिव के जटाजूट का शृंगार करने को लालायित होने लगे हैं. इतने आतुर की खुद ही जमीन में गिर जाते हैं कि उनको सहजता से माली चुनकर शिवालय तक पहुंचा दे.

सरोवरों में इक्के-दुक्के प्रवासी पक्षियों का भी आगमन होने लगा है. अल्प समय के लिए ही सही, सफेद रंगों के आकर्षण का जादू मन को उत्सव की रंगीनियों से भर जाता है. कास का खिलना जहां दुर्गोत्सव का संदेश लेकर आता है, वहीं प्रवासी पंछियों का आना शीत के आगमन का. यही समय है जब वन-उपवन, बाग-उद्यान कोटि-कोटि रंगों वाले फूल से सजने लगते हैं.

प्रकृति अपना हर काम प्रतिबद्धता और निरंतरता से करती है. सदियों से चली आ रही यह निरंतरता अपने अलग-अलग आयामों के साथ यही तो संदेश देना चाहती है.

उसका हर आगाज सबके लिए स्वागत करने योग्य नहीं होता है. कोई बारिश की तबाही से त्रस्त हो जाता है, तो कोई ठंड की मार से तो कोई गर्मी की ताप से. प्रकृति अपनी इच्छाओं का दमन कर दूसरों की खातिर जीना सिखाती है. यह सहनशीलता का पाठ पढ़ाती है. मौसमों पर अपना हक नहीं, उनको सहना ही होगा. इसलिए तो ज्ञानी दुख में भी आनंद खोजने की सीख देते हैं.

ठंड की विभीषिका में नर्म गुनगुनी धूप कैसे सहलाती है, गर्मी की आफत में बारिश की छिटपुट फुहारें कैसे बहलाती हैं! यह क्षणिक आनंद ही जीने का कारण बनता है. आनंद का रंग अक्षय और अमिट है. शाश्वत है.

हम विगत के अवलोकन में दुख के सफहे फाड़कर सुख को ही स्मृति-शेष बनाकर रखते हैं, क्योंकि वह आनंद का स्रोत होता है. आनंद की अनुभूति सब रंगों से परे है. यह रंगहीन होकर भी सबसे चटख और चमकीला है. प्रकृति चंद दिनों के बाद अपना रंग बदलेगी, तो हमें भी अपनी अनुभूतियों को आनंद से सराबोर करने के लिए संवेदनाओं के सूक्ष्म-छिद्र खोलने होंगे.

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