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कानून ठीक से लागू हों

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अन्यायपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है कि नागरिकों के साथ जांच संस्थाएं भी कानूनों का सही तरीके से पालन करें. अगर ऐसा नहीं होता है, तो वही कानून बुनियादी अधिकारों से लोगों को वंचित करने का औजार बन सकते हैं. बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न निर्णयों में इस मुश्किल का हल निकालने के कुछ अहम संदेश दिये है.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वरिष्ठ वैज्ञानिक नांबी नारायण को 24 साल पहले शोध तकनीक बेचने के झूठे मामले में फंसाया गया था. हालांकि उन्हें 1998 में ही आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया गया था, लेकिन इस महान वैज्ञानिक ने लड़ाई को जारी रखते हुए अपने सम्मान को बहाल करने तथा उन्हें प्रताड़ित करनेवाले पुलिसकर्मियों को दंडित करने का निवेदन सर्वोच्च न्यायालय से किया था.
अदालत ने इस प्रकरण में कहा है कि गिरफ्तारी और प्रताड़ित करने की कोई जरूरत नहीं थी. वैज्ञानिक नारायण को पुलिस से 50 लाख रुपये बतौर मुआवजा देने और सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से पुलिस की भूमिका की जांच का आदेश अदालत ने दिया है. एक अन्य अहम फैसले में अदालत ने कहा है कि किसी के वाहन सेसिर्फ बंदूक की गोली बरामद होने के आधार पर उस व्यक्ति पर हथियारों से संबद्ध धाराओं को लगाने का कोई मतलब नहीं है.
दंड संहिता के प्रावधानों को लागू करने से पहले पुलिस को यह साबित करना होगा कि आरोपित को ऐसी चीज की मौजूदगी की जानकारी थी और वह उसके नियंत्रण में थी. इसी कड़ी में दहेज और घरेलू हिंसा से जुड़े कानून के तहत दर्ज मामले की सुनवाई करते हुए देश की बड़ी अदालत ने पिछले साल के अपने ही एक निर्णय को संशोधित किया है.
बीते बरस अदालत ने कहा था कि इस प्रावधान के तहत गिरफ्तारी तभी होगी, जब परिवार कल्याण समिति अपनी रिपोर्ट में आरोप को ठोस करार दे दे. तब यह दलील दी गयी थी कि दहेज प्रताड़ना के खिलाफ बने कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है. इस पर सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया थी कि आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी नहीं होने से पीड़िता पर दबाव बढ़ सकता है.
इसके साथ ही निचली अदालत को पारिवारिक समझौते या कुछ स्थितियों में पत्नी द्वारा पति और ससुरालवालों पर लगाये गये आरोपों को खारिज करने का अधिकार भी था. सर्वोच्च न्यायालय ने तमाम पहलुओं को संज्ञान में लेते हुए एक संतुलित व्यवस्था देने का प्रयास किया है. अब निचली अदालत को आरोपों को पूरी तरह से खारिज करने का अधिकार नहीं होगा. पुलिस को आरोपितों को गिरफ्तार करने से पहले प्रारंभिक स्तर पर स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप जांच करनी होगी.
अगर आरोप गंभीर हैं या आरोपित जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहे हैं, तभी गिरफ्तारी करने का निर्देश दिया गया है. उम्मीद है कि इन अदालती फैसलों से पुलिस के रवैये में सकारात्मक बदलाव आयेगा, जो कि नागरिक और न्यायिक अधिकारों के लिए बेहद अहम है.
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