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कर्जखोर, निकम्मा और बेशर्म

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आलोक पुराणिक

वरिष्ठ व्यंग्यकार

puranika@gmail.com

इधर डर लगने लगा मुझे कि कहीं मेरे ईमेल बाॅक्स पर किसी की पहुंच न हो जाये. मेरा ईमेल बाॅक्स अगर पब्लिक हो गया, तो मुझे सिर्फ कर्जखोर, निकम्मा और बेशर्म ही माना जा सकता है. और इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है. ईमेल कैसे आएं, इस पर मेरा कोई बस नहीं है.

एक ईमेल लगभग रोज आता है, किसी क्रेडिट कार्ड वाले का है, इस मेल में होता है कि आपका क्रेडिट कार्ड तैयार हो गया है. इस लिंक पर क्लिक करें, डिस्पैच हो जायेगा क्रेडिट कार्ड. पर पर मैंने तो किसी क्रेडिट कार्ड के लिए एप्लाई नहीं किया था.

अब वक्त दूसरे हैं, बंदे को उधार चाहिए या नहीं, तमाम कंपनियां तमाम बैंक उधार देने को आतुर बैठे हैं. बिना मांगे क्रेडिट कार्ड लो. फिर ईमेल में एक दूसरा आॅफर आता है- एक और शादीडाॅटकाॅम का आॅफर है, दूसरी शादी में आपकी रुचि है, तो इतने आॅफर हैं. पर मैंने तो कभी दूसरी शादी में रुचि नहीं दिखायी? मुझे दूसरी शादी नहीं करनी.

जी, बंदे का बस चले तो पहली शादी में भी रुचि ना दिखाये. पर घरवाले घेर-बांधकर एक शादी तो भारतवर्ष में करा ही देते हैं. उस शादी से उपजी जिम्मेदारियों में भी पूरा जीवन शांति से निकल जाये, इतनी भर आम आदमी की कामना होती है. पर यह शादीडाॅटकाॅम दूसरी शादी भी करवाने पर आमादा है. मुझे बताया गया कि यह नया स्टार्टअप है. नये स्टार्टअप की मदद करना हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है.

शादीडाॅटकाॅम की मदद करने के लिए जरूरी है कि बंदा पहली शादी खत्म करे. पर ये कैसी बेशर्म बातें हैं? नहीं करनी मुझे दूसरी शादी.

जी, ऐसे ही लोगों की वजह से तो नये उद्योग-धंधे पनप नहीं पा रहे हैं. नये स्टार्टअप की मदद के लिए जो भी कुछ भी बन पड़े, लोगों को करना चाहिए.

अपने ईमेल संदेशों का विश्लेषण करता हूं, तो एक ऐसे व्यक्ति की इमेज उभरती है, जो सिर्फ उधार लेने के चक्कर में रहता है, जिसके पास तरह तरह के क्रेडिट कार्डों के ऑफर आते हैं, और जो दूसरी शादी के चक्कर में रहता है.

और कुछ मैसेज ऐसे भी हैं, जिनमें कोई नाइजीरियन प्रिंस बता रहा होता है कि मेरे पास 7897878777 पौंड हैं, आप मेरी मदद करें. ये पैसे मैं आपके खाते में ट्रांसफर कर दूंगा, पर आप मुझे पहले पांच लाख रुपये दे दें. मनी लांड्रिंग के लिए भी मैं ही मिला था?

मैं खुद को मनी लांड्रिंग और दूसरी शादी के आरोपी के तौर पर देखने लग जाता हूं, और उधार खाऊ तो मैं दिखता ही हूं मैं ईमेल संदेशों में.

मैंने ना कभी क्रेडिट कार्ड के लिए एप्लाई किया, ना कभी दूसरी शादी की सोची. हमने कुछ न किया, यही बात विजय माल्या भी कहते हैं. तो इसका मतलब, क्या मैं खुद को विजय माल्या मान लूं?

नहीं बेटे तुम विजय माल्या नहीं हो सकते. तुम्हारी औकात कहां कि एक लाख रुपये भी लेकर भाग लो. बैंक वाले, क्रेडिट कार्ड वाले तुम्हारे हलक से एक-एक पाई निकलवा लेंगे.

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