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चलो कुछ मीठा हो जाये!

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शफक महजबीन

टिप्पणीकार

mahjabeenshafaq@gmail.com

हमारे देश में यह परंपरा रही है कि जब कोई किसी के घर जाता है, तो उसे पानी के साथ कुछ मीठा खाने को दिया जाता है. गांवों में गुड़-पानी, तो शहरों में मिठाई या चाय-पानी का चलन है. जैसे-जैसे हम आधुनिक होते जाते हैं, हमारी परंपराओं में बदलाव होते रहते हैं और वे नूतन होती जाती हैं, लेकिन वे पूरी तरह बदलती नहीं हैं.

आज भी कुछ परंपराएं तो वही हैं, पर उसमें शामिल मिठास बदल गयी है. अब मिठाइयों की जगह धीरे-धीरे चॉकलेट लेती जा रही है. चॉकलेट हम सभी को पसंद आती है. दीपावली हो या कोई अन्य त्योहार, चॉकलेट का क्रेज बढ़ता ही जा रहा है. चॉकलेट अब बाजार का बेहतरीन हिस्सा है. इसीलिए त्योहारों के आने पर चॉकलेट कंपनियां अपने चॉकलेट उत्पादों के प्रचार-प्रसार में लग जाती हैं. कुछ त्योहारों में एक-दूसरे के घर बतौर गिफ्ट मिठाई के डिब्बे की जगह अब चॉकलेट लेकर जाने का चलन बढ़ रहा है और बाजार इसको तेजी से भुनाते हुए कह रहा है- चलो कुछ मीठा हो जाये!

आज का दिन भी किसी त्योहार से कम नहीं है, क्योंकि आज ‘अंतरराष्ट्रीय चॉकलेट दिवस’ है. अमेरिका की सबसे पुरानी चॉकलेट कंपनी ‘हर्शे चॉकलेट कंपनी’ के संस्थापक ‘मिल्टन एस हर्शे’ के जन्मदिन (13 सितंबर, 1857) को ‘इंटरनेशनल चॉकलेट डे’ के रूप में मनाया जाता है.

वैश्विक बाजार बनती इस दुनिया में पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति ने भारतीय युवाओं पर कुछ ऐसा असर डाला है कि वे अब हर दिवस को त्योहारों की तरह हर्षोल्लास से मनाने लगे हैं. फरवरी में वैलेंटाइंस वीक के तीसरे दिन जो ‘चॉकलेट डे’ आता है, वह शायद इसी बात की अलामत है कि प्यार भरे रिश्ते की शुरुआत कुछ मीठा खाकर करनी चाहिए. वैसे भी हमारे देश में जब भी कोई कामयाबी, लाभ, पद-प्रतिष्ठा, जन्मदिन या खुशी का कोई भी मौका आता है, तो हम फौरन कहते हैं- ‘भई मुंह मीठा कराओ!’ यही वह तथ्य है, जिसे चॉकलेट कंपनियों ने शानदार तरीके से भुनाया है. ऐसे में जाहिर है, चॉकलेट का भी एक ‘इंटरनेशनल डे’ तो होना ही था, जो हर्शे के जन्मदिन से बेहतर क्या हो सकता था.

चॉकलेट ‘थेयोब्रोमा कोको’ नाम के पेड़ के बीज ‘कोको’ से बनायी जाती है. कोको पर खमीर उठने पर इन्हें सुखाते हैं और फिर उसकी बाहरी परत हटा देते हैं, फिर उसी से चॉकलेट तैयार करते हैं. सवाल है कि आखिर चॉकलेट में ऐसा क्या है कि इसके लिए एक इंटरनेशनल डे मनाया जाये? भारत कृषि प्रधान देश है, लेकिन यहां न तो कोई ‘गेहूं दिवस’ है, न ‘चावल दिवस’ है, न ही ‘दाल दिवस’ है. भोजन के लिए बुनियादी सामग्री यही हैं, लेकिन इनके लिए कोई दिवस नहीं है. चूंकि पश्चिमी सभ्यता के लोग हर दिन को खास बनाकर चलते हैं और वहां चॉकलेट खुशी के इजहार का जरिया है, शायद यही वजह है कि इसके लिए उन्होंने एक दिन मुकर्रर कर दिया है. तो आज आप भी इस दिन को मनाइये और चॉकलेट में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स से अपने दिल की बीमारियों को बचाइये.

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