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चालू खाते का संकट

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रिजर्व बैंक के नये आंकड़ों के लिहाज से चालू खाते के घाटे की तस्वीर चिंताजनक है. मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल-जून की पहली तिमाही में यह घाटा 15.8 अरब डॉलर हो गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 15 अरब डॉलर का था.
वैसे जीडीपी के अनुपात के हिसाब से यह 2.4 फीसदी है, जो बीते साल की पहली तिमाही में 2.5 फीसदी था. इसका मतलब यह है कि एक साल में जीडीपी का परिमाण बढ़ा है, जिसके कारण चालू खाता घाटा कम नजर आ रहा है. लेकिन इस आधार पर निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता है, क्योंकि इसी अवधि में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 11.3 अरब डॉलर घटा है, जबकि पिछले साल विदेशी मुद्रा भंडार 11.4 अरब डॉलर बढ़ा था.
इसी बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब आठ अरब डॉलर की राशि निकाली है, पर पिछले साल शेयर बाजार में 12.5 अरब डॉलर के आसपास निवेश हुआ था. सो, चालू खाते के घाटे की तुलना करके आगे तुरंत बेहतरी की उम्मीद करना ठीक नहीं है. निर्यात का मूल्य अगर आयात के मूल्य की तुलना में कम हो जाये, तो इसे चालू खाते के घाटे के रूप में देखा जाता है.
जाहिर है, फिलहाल डॉलर के बरक्स रुपये के गिरती कीमत के बीच देश की कुल विदेशी परिसंपदा का मोल घट रहा है और यह संकेत करता है कि विदेशी मुद्रा में कमाई कम और भुगतान ज्यादा है. इस लिहाज से आर्थिक मोर्चे पर संकट दोहरा है. तेल में उछाल और डॉलर की मजबूती से चालू खाता घाटे के 2.5 फीसदी होने के आसार हैं.
विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति अभी ठीक है और इसके सहारे इस घाटे को कुछ दिनों तक बर्दाश्त किया जा सकता है. अगस्त तक यह भंडार लगभग 400 अरब डॉलर आंका गया है, पर यह भी गौरतलब है कि मार्च के आखिर से अब तक 24 अरब डॉलर की मुद्रा बाहर गयी है. इन स्थितियों का असर शेयर बाजार पर भी नजर आ रहा है, जहां बीते सोमवार को मार्च के बाद सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है.
रुपये की गिरावट और विदेशी निवेशकों के रकम निकालने से बाजार में बिकवाली का माहौल है, जिसके कारण शेयर बाजार नीचे गिर रहा है. विदेशों से कर्ज लेनेवाली देशी कंपनियों पर डॉलर की चढ़ती कीमतों के कारण ब्याज अदायगी का बोझ पहले की तुलना में बढ़ गया है और इससे उनके मुनाफे पर भी नकारात्मक प्रभाव हो रहा है.
बाजार में भरोसे का माहौल बनाये रखने और रुपये की गिरती कीमत पर अंकुश लगाने के लिए अगले कुछ दिनों में ठोस कदम उठाने की दरकार है. रिजर्व बैंक ने इस दिशा में कुछ संकेत भी दिये हैं. महंगाई को काबू में रखने के लिए इस केंद्रीय बैंक ने वक्त रहते ब्याज दर में बढ़ोतरी की है.
इन उपायों के साथ यह भी जरूरी है कि निर्यात बढ़ाने के गंभीर प्रयास हों. परंतु, यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वर्तमान आर्थिक समस्याओं को सघन करने में अनेक अंतरराष्ट्रीय कारकों का भी योगदान रहा है. ऐसे में सरकार और रिजर्व बैंक के पास कुछ राहत उपलब्ध कराने के अलावा बहुत विकल्प नहीं हैं.
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