[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion भीड़तंत्र राष्ट्रवाद नहीं

भीड़तंत्र राष्ट्रवाद नहीं

0

हिंसक भीड़ के हाथों हो रही हत्याओं के सिलसिले पर अंकुश लगाने के सर्वोच्च न्यायालय के प्रयासों के बीच उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने याद दिलाया है कि राष्ट्रवाद का अर्थ बहुत व्यापक है और इस अर्थ को जाति, धर्म, रंग, नस्ल आदि पर आधारित भेदभाव के कठघरे में रहकर परिभाषित नहीं किया जा सकता.

उन्होंने रेखांकित किया है कि जाति-धर्म के नाम पर ‘किसी दूसरे की हत्या करके कोई किस तरह अपने को राष्ट्रवादी कह सकता है, ‘भारतमाता की जय’ का इतना संकुचित अर्थ नहीं लगाया जा सकता है.’ कोई विचार कितना भी पवित्र और महिमावान क्यों न हो, उसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है. राष्ट्रवाद ऐसी ही महत्वपूर्ण अवधारणा वाला शब्द है.

हत्या पर उतारू किसी भीड़ को कतई यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह ऐसे विचारों की व्याख्या का अधिकार अपने हाथों में ले. पवित्र विचारों की रक्षा का दायित्व सबका है, लेकिन इसमें अहम भूमिका समाज के बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व की होती है, क्योंकि जनमत के निर्माण मे दोनों बहुत निर्णायक होते हैं.

उपराष्ट्रपति ने इस भूमिका का सार्थक निर्वाह करते हुए यह भी उचित ही कहा है कि भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए विशेष कानून बनाना भर पर्याप्त नहीं हो सकता है, बल्कि समाज में व्याप्त भेदभाव के प्रति लोगों को जागरूक करना और सामाजिक जीवन के आचार-विचार में परिवर्तन का प्रयास भी समान रूप से आवश्यक है.

इस भयावह प्रवृत्ति और इसके परिणामस्वरूप होनेवाली घटनाओं का राजनीतीकरण कोई समाधान नहीं है. इन्हें एक गंभीर सामाजिक मनोरोग के तौर पर देखा जाना चाहिए. लेकिन किसी मनोन्माद के जोर पकड़ने के अवसरों की पहचान भी आवश्यक है, ताकि तात्कालिक और दीर्घकालिक कारणों की समीक्षा की जा सके.

वैश्विक शांति सूचकांक की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘राजनीतिक अतिवाद’ तथा ‘सामाजिक संघर्ष के पैमाने पर भारत का अंकमान चिंताजनक ऊंचाई पर है. सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ समय पहले इस संदर्भ में विशेष कानून बनाने की जरूरत पर बल दिया था.

न्यायालय की सक्रियता के फलस्वरूप हाल में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भीड़ द्वारा की जा रही हिंसा की रोकथाम के लिए उपाय, कार्ययोजना और क्रियान्वयन सुझाने के लिए हाल में दो उच्च-स्तरीय समितियों का गठन किया है.

उपराष्ट्रपति नायडू की राय से स्पष्ट है कि जन-जागरूकता के प्रयास, विशेष कानून का निर्माण, न्यायिक सक्रियता, विधि व्यवस्था की सतर्कता और नेतृत्वकारी वर्ग का आगे बढ़कर राष्ट्रवाद के व्यापक अर्थ की ओर ध्यान दिलाना जैसी सभी पहलें सामाजिक हिंसा के मनोन्माद पर नियंत्रण और उसके उपचार के लिए आवश्यक हैं. इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि हिंसक और अराजक वातावरण में राष्ट्र की प्रगति एवं समृद्धि की आकांक्षाएं साकार नहीं हो सकती हैं.

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel