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बैंकों की बेहतरी

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स्टेट बैंक के प्रमुख रजनीश कुमार ने फंसे कर्जों के बढ़ते बोझ की अनेक वजहें गिनायी हैं. उन्होंने ‘कंसोर्टियम’ की व्यवस्था को मुख्य रूप से जिम्मेदार मानते हुए सरकार और न्यायपालिका पर भी अप्रत्यक्ष तौर से सवाल उठाया है.
बड़ी समस्या के कारणों को सिर्फ किसी संस्था या प्रबंधन की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि व्यवस्था की पूरी बनावट में खोजा जाना चाहिए. देश का बैंकिंग तंत्र कर्जों के भारी बोझ से गंभीर संकट में है.
समाधान के कुछ कदम उठाये भी गये हैं. फिर भी कर्ज का भार बढ़ ही रहा है. साल 2013-14 में बैंकों की सकल गैर निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) दिये गये कुल कर्ज का 3.8 फीसदी थी, 2016-17 में बढ़कर 7.5 फीसदी तक पहुंच गयी है. यह आशंका भी जतायी गयी है कि चालू वित्त वर्ष में यह आंकड़ा 11.5 फीसदी (करीब 10.3 लाख करोड़) हो सकता है.
पिछले साल एनपीए 9.5 फीसदी (लगभग आठ लाख करोड़) रहा था. ऐसे में मौजूदा उपायों और सुधारों के साथ ठोस एवं स्थायी समाधान के लिए प्रक्रियागत कमियों को भी दूर करने की जरूरत है. स्टेट बैंक अध्यक्ष की राय है कि व्यावसायिक इकाइयों को कर्ज देने के लिए बनी ‘कंसोर्टियम’ (इसमें अनेक बैंक मिलकर तय करते हैं) के कारण अनावश्यक देरी होती है.
उनका तर्क है कि बैंकिंग कारोबार भरोसे पर चलता है. किसी कंपनी की साख के मूल्यांकन और कर्ज की वसूली में बैंक सीबीआइ जैसी जांच एजेंसियों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते हैं. चूंकि यह एक वाणिज्यिक हिसाब-किताब है, इस कारण अनेक आयामों पर पहले से ही कुछ निर्धारित कर पाना मुश्किल है.
किसी परियोजना के भविष्य के बारे में सरकारी नीतियों या अदालती रवैये को लेकर सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. उदाहरण के रूप में कोयला खदानों के आवंटन को लिया जा सकता है. इस संबंध में सरकारी फैसले को अदालत ने खारिज कर दिया था. आवंटन के आधार पर कंपनियों को कर्ज देते समय बैंकों के लिए इस स्थिति का अंदाजा करना असंभव था.
निश्चित तौर पर बैंक प्रमुख ने कुछ अहम बातों की ओर इंगित किया है और उन पर विचार जरूर किया जाना चाहिए, परंतु उनके इस तर्क को मानने का कोई आधार नहीं है कि अदालती फैसलों का भी एनपीए की बढ़वार के संकट में योगदान है. यदि न्यायालय भ्रष्टाचार या किसी प्रक्रियागत खामी के आधार पर निर्णय देता है, उसे राजव्यवस्था के वैधानिक होने के जन-विश्वास को बरकरार रखने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि न्यायिक प्रणाली की यही प्राथमिक जिम्मेदारी है.
इस जिम्मेदारी को निभाते हुए अदालतों के लिए बैंकों या कंपनियों के व्यावसायिक हितों का ध्यान रखने का कोई औचित्य नहीं है. उम्मीद है कि बैंकिंग प्रणाली को बेहतर बनाने की दिशा में सरकार, बैंक और उद्योग जगत निरंतर प्रयासरत रहेंगे तथा सोच-विचार के साथ समुचित कदम उठाते रहेंगे.
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