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Home Opinion प्रेमचंद की यह छवि-विकृति!

प्रेमचंद की यह छवि-विकृति!

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रविभूषण

वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष प्रेमचंद को अधिक याद किया गया है. इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘ईदगाह’ कहानी के हामिद से प्रेरणा प्राप्त करने की बात कही. उन्हें उज्ज्वला योजना के लिए हामिद ने प्रेरणा दी. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रेमचंद की वर्षगांठ पर उनके प्रति श्रद्धांजलि प्रकट की और एक ट्वीट में प्रेमचंद को महान लेखक और उपन्यासकार कहा.

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, संस्कृति राज्यमंत्री महेश शर्मा को भी इस वर्ष प्रेमचंद याद आये. ममता बनर्जी और राहुल गांधी ने भी उन्हें याद किया. राहुल गांधी ने हिंदुस्तान के इस महानतम लेखक को प्रणाम करते हुए उनके ‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’ लेख (15 जनवरी, 1934) का यह अंश भी उद्धृत किया- ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भांति, जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है.’

प्रेमचंद को पढ़ने और समझने से केवल लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों और संपादकों को ही नहीं, नेताओं को भी बहुत फायदे हैं. प्रेमचंद का एक गलत पाठ भी किया जाता रहा है, जिसके अगुआ कमल किशोर गोयनका रहे हैं.

पचास-पचपन वर्ष से वह प्रेमचंद-विशेषज्ञ हैं, पर उन्होंने प्रेमचंद की एक ‘हिंदूवादी छवि’ भी गढ़ी है. सन् 1902-03 से 1936 तक के प्रेमचंद के लेखन को उसकी संपूर्णता में और उसके तीन विकास-चरणों (1902-03 से 1918, 1918 से 1930 और 1930 से 1936) में समझने की जरूरत है. इस वर्ष प्रेमचंद की जयंती पर ‘पांचजन्य का विशेष आयोजन’ (5 अगस्त 2018) प्रेमचंद को भगवा रंग में रंगने के लिए है. ‘पांचजन्य’ के इस अंक के आवरण-पृष्ठ पर उन्हें ‘कलम राष्ट्रवादी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है- ‘कुछ लोग अपने हितों को पोसने के लिए कथा-सम्राट को वामपंथी खांचे में बंद करने की कोशिश करते हैं, किंतु प्रेमचंद के लेखन में सदा गूंजता है राष्ट्रप्रेम.’

‘पांचजन्य’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रकाशित हिंदी साप्ताहिक पत्र है. 14 जनवरी, 1948 को मकर संक्रांति के दिन संघ प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय ने लखनऊ में इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था. इसके पहले संपादक अटल बिहारी वाजपेयी थे. वर्तमान में इसके संपादक हितेश शंकर हैं, जिन्होंने युवा पत्रकार प्रशांत राजावत को यह कहा था कि हम पत्रकार नहीं प्रचारक हैं. संघ हिंदू, राष्ट्र, राष्ट्रीयता, संस्कृति सबको अपने अनुसार व्याख्यायित करता है. उसकी दृष्टि ‘हिंदुत्व’ वादी है.

संपादकीय का आधा हिस्सा कांग्रेस पार्टी और उसके गठबंधन पर है. उसमें ‘आज समाज के झूठे प्रगतिशीलों की बजाय सच्चे प्रेमचंद की ज्यादा जरूरत’ पर बल है. ‘पांचजन्य’ ने कुछ उद्धरणों-उदाहरणों के द्वारा प्रेमचंद की एक गलत छवि प्रस्तुत की है, जिसका राजनीतिक मकसद है. कमल किशोर गोयनका ने अपने इंटरव्यू में ‘महाजनी सभ्यता के द्वारा व्यक्त आक्रोश’ को ‘सामाजिक’ न कहकर ‘व्यक्तिगत’ कहा है. गोयनका के सुवचन हैं- ‘प्रेमचंद की मूल आस्थाएं हिंदू आस्थाएं हैं. उनकी मूल आस्था भारतीयता है.’

प्रेमचंद के धर्म, हिंदू धर्म, संस्कृति, सांप्रदायिकता, राष्ट्रीयता, चुनाव, गौकशी, धार्मिक कट्टरता, हिंदू-मुस्लिम एकता, धन, स्वराज्य आदि पर उनके विचारों को समझने की जरूरत है.

प्रेमचंद ने संस्कृति का धर्म से कोई संबंध नहीं माना था- ‘संस्कृति का धर्म से कोई संबंध नहीं, मुस्लिम या हिंदू संस्कृति नाम की कोई चीज नहीं… अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक संस्कृति.’ सांप्रदायिकता को उन्होंने ‘समाज का कोढ़’ कहा है.

‘राष्ट्रीयता’ भी उनके अनुसार वर्तमान युग का उसी तरह का काेढ़ है. जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ सांप्रदायिकता थी. ‘क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं’ (8 जनवरी, 1934) में उन्होंने पुजारियों, पुरोहितों और पंडों को ‘हिंदू जाति का कलंक’ कहा है. गाय का महत्व उनकी दृष्टि में आर्थिक दृष्टि के अलावा और कुछ नहीं है. इस्लाम उनके अनुसार तलवार के बल पर नहीं फैला. अपने धर्मतत्वों की व्यापकता के कारण वे इस्लाम का फैलाव मानते हैं.

उन्होंने ‘मनुष्यता का अकाल’ में लिखा था कि धर्म को राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धि का साधन बना लिया गया है. ‘पांचजन्य’ के इस अंक में ऐसे लेखक भी हैं, जो ‘गोदान’ में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ देखते हैं. यह प्रेमचंद के अध्ययन-मूल्यांकन की ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्रवादी’ दिशा है, जिसका प्रेमचंद ने सदैव विरोध किया था. गौकशी के मामले में उन्होंने हिंदुओं के जिस ‘अन्यायपूर्ण ढंग अख्तियार’ करने की बात कही थी, वह आज अधिक विकराल रूप में है.

प्रेमचंद ‘हिंदू भारत’ की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. उन्होंने हमें आगाह किया था, चेतावनी दी थी और सही मार्ग दिखाया था. उन्हें ‘हिंदूवादी’ माननेवालों को ध्यानपूर्वक विविध प्रसंग खंड-2 का ‘हिंदू-मुस्लिम खंड’ (पृष्ठ 349 से 433) पढ़ना चाहिए. साल 1933 में जब जर्मनी में नाजी पार्टी की जीत हुई थी, प्रेमचंद ने ‘जर्मनी का भविष्य’ (20 मार्च, 1933) में प्रश्न किया था ‘क्या वास्तव में जर्मनी फासिस्ट हो जावेगा?’ प्रेमचंद प्रगतिशील हैं और सदैव रहेंगे.

उनके गलत पाठ का हमेशा विरोध किया जायेगा. हिंदुत्ववादियों ने विवेकानंद, गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, आंबेडकर को हथियाने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुए. प्रेमचंद के प्रगतिशील साहित्य को अपने मनोनुकूल सिद्ध करने में वे कभी सफल नहीं हो सकते.

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