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बच्चियों को न्याय कब

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‘जघन्य’ अपराध कानून के दुस्साहसी उल्लंघन, प्रशासनिक चूक या फिर व्यवस्था को धोखा देनेभर का मामला नहीं होते, वे समाज और शासन की बुनियादी नैतिक मान्यताओं के ध्वस्त होने की सूचना होते हैं.

वे भयावह संकेत करते हैं कि मनुष्य होने और बने रहने की संभावनाएं खतरे में हैं. शरण में आये व्यक्ति पर अत्याचार ऐसे ही एक अपराध है. इसी कारण मुजफ्फरपुर, देवरिया और हरदोई के बालिका संरक्षण गृहों की अबोध बच्चियों के साथ हुआ दुष्कर्म बतौर एक नैतिक इकाई पूरे देश को शर्मसार और झकझोरनेवाली घटनाएं हैं.

मुजफ्फरपुर की घटना सामने आने के वक्त से ही ऐसी आशंका जतायी जा रही थी कि बात सिर्फ एक जिले या एक सूबे तक सीमित नहीं है. कई जगहों पर बालिका संरक्षण-गृहों में अत्याचार की आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं. बेसहारा अबोध बच्चियों के दर्दनाक बयान हमें आगाह करते हैं कि देश में बच्चों, विशेषकर कम उम्र लड़कियों, के प्रति एक आपराधिक मानसिकता धीरे-धीरे एक सामान्य बरताव बनकर हमारी आंखों के आगे जड़ जमाती जा रही है.

बच्चों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में आयी हैरतअंगेज तेजी इस सच को रेखांकित करती है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, 2014 में बच्चों के खिलाफ हुए अपराध के 89,423 और 2016 में 1,06,958 मामले दर्ज हुए. अगर एक दशक के लिहाज से देखें, तो बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों में 500 फीसदी (2006 में 18,967 तथा 2016 में 1,06,958 मामले) की बढ़त हुई है.

इनमें यौन-दुराचार की घटनाएं विशेष रूप से बढ़ी हैं. पोक्सो कानून के तहत 2014 में 8,904 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2016 में ऐसे 35,980 मामले प्रकाश में आये यानी तीन सालों में इन अपराधों में चार गुणा का इजाफा हुआ है. बच्चों के खिलाफ हुए अपराधों में सबसे ज्यादा तादाद अगवा और अपहरण (49 फीसदी) तथा बलात्कार (18 फीसदी) की घटनाओं की है. हाल में 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के अपराध में मृत्युदंड तथा 16 साल से कम आयु की किशोरियों से दुष्कर्म में अपराधी को अत्यंत कठोर सजा देने के विधेयक को संसद ने मंजूरी दी है.

लेकिन, कानून का होनाभर ही अपराधों को रोकने के लिए काफी नहीं होता. मुजफ्फरपुर के बाद देवरिया और हरदोई के बालिका संरक्षण गृह की बच्चियों के खिलाफ हुए अपराध के ब्योरे प्रशासनिक लापरवाही तथा शासन के अगंभीर रवैये का इशारा करते हैं.

अपराध की सहायक परिस्थितियों को पनपने नहीं देना और निगरानी के तंत्र को चौकस रखना प्रशासन की प्राथमिकताओं में होना चाहिए. नागरिक संगठनों और मीडिया को भी सकारात्मक और सक्रिय रहना जरूरी है. दुर्भाग्य है कि शासन-प्रशासन ऐसी भयावह घटनाओं में भी थोथी बयानबाजी और ढर्रे पर काम करते नजर आ रहे हैं. इस रवैये से इंसाफ की उम्मीद धूमिल ही होती है.

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